
पूर्णिया : गोत्र हम सनातनी की पहचान को दर्शता है और यह हमारी जाति हमारे पूर्वज की याद दिलाता है जिससे हमारी पहचान होती है. गोत्र की चर्चा मुख्य रूप से शादी, अनुष्ठान, पूजा या कोई नव निर्माण कार्य या गृह प्रवेश समेत अन्य कई शुभ और मांगलिक कार्यों में चर्चा की होती है.
पूर्णिया के पंडित मनोत्पल झा कहते हैं की गोत्र का चर्चा सबसे पहले विवाह में किया जाता है लड़का और लड़की को देखने सुनने के दौरान इसकी चर्चा की जाती है. गोत्र का अर्थ है कि वह जो व्यक्ति है उसका पूर्वज क्या है किन ऋषियों की संतान है उसकी उत्पत्ति कहां से हुई ब्राह्मणों में अधिकांश यह गोत्र और मूल का अधिक महत्व दिया जाता है. उन्होंने कहा आप किस गोत्र और किस मूल से जुड़े हैं साथ ही ब्राह्मण, भूमिहार, कायस्थ और वैश्य समाज में भी गोत्र की चर्चा खूब होती है.
गोत्र का मतलब होता हैं कि आपके पुराने वंसज
उन्होंने कहा की गोत्र का मतलब यानी कहे तो सबसे पहले उसकी उत्पत्ति कहां से हुई है गोत्र का संधि विच्छेद करते हैं गो+ त्र= गोत्र यानी अपनी इंद्रियों की रक्षा करना. वही उन्होंने कहा इसका मतलब हमलोग किस गोत्र और किस वंसज के ऋषि है इन बातों को दर्शता हैं. उन्होंने कहा यदि एक गोत्र के दोनों पक्ष के लोग हो तो ऐसे स्तिथि में एक गोत्र में शादी नहीं होती है. ये दोनों आपस में अपने वंशज और अपने परिवार के लोग हो जाते हैं, जिस कारण दोनो के रिश्ते आपस में नहीं होते.
सबसे पहले आये ये चार गोत्र
पूर्णिया के पंडित मनोत्पल झा कहते है कि सबसे पहले मूल रूप से चार गोत्र ही थे अंगिरा, कश्यप, वशिष्ठ और भृगु यह चार गोत्र थे. यह चार ऋषि थे यही चार ऋषि के जो संतान थे उन्हीं से वंश बढ़ता गया. इसके बाद ये गोत्र आया जमदग्नि, विश्वामित्र, अगस्त, शांडिल्य, वत्स, भारद्वाज, कुंडीन, कपि, बेन्या, गौतम, गर्ग, परासर सहित अन्य कई गोत्र का जिक्र हिंदू धर्म में प्रचलित है. उन्होंने कहा कि कुल 115 गोत्र में से 108 गोत्र पूरी तरह प्रचलित हैं. वहीं उन्होंने कहा अब तक हमारे पूर्वज ने नए रिश्ते करने के दौरान गोत्र और मूल का खास तौर पर ख्याल रखते हैं और हम लोग भी आगे अपने सभ्यता और संस्कृति परंपरा को निभाने का काम करेंगे.
FIRST PUBLISHED : December 15, 2024, 08:07 IST






