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Upnayan Sanskar Ceremony: उपनयन संस्कार में भिक्षा लेना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. ऐसा कहा जाता है कि भिक्षा मांगने से अहंकार नष्ट हो जाते हैं. व्यक्ति के अंदर विनम्रता आती है और उसे कठिन से कठिन परिस्थिति क…और पढ़ें

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जानें उपनयन संस्कार में पुत्र अपनी माता से क्यों लेता है भिक्षा?
हाइलाइट्स
- उपनयन संस्कार में भिक्षा लेना महत्वपूर्ण है.
- भिक्षा मांगने से अहंकार नष्ट होता है.
- मां से भिक्षा लेने का अर्थ प्रेम और आशीर्वाद है.
“मां, मुझे भिक्षा दो”—जैसे ही कोई बालक अपने उपनयन संस्कार के दौरान यह वाक्य कहता है, उस पल में सिर्फ एक परंपरा ही नहीं निभाई जाती, बल्कि सनातन संस्कृति का गहरा संदेश भी छिपा होता है. अब सवाल ये है कि मां से ही भिक्षा क्यों ली जाती है? और ब्राह्मणों के लिए यह संस्कार अनिवार्य क्यों माना जाता है? अगर आपके मन में भी ये सवाल हैं, तो आइए इस रहस्य से पर्दा उठाते हैं.
उपनयन संस्कार
सनातन धर्म में कुल 16 संस्कार होते हैं, और उनमें से उपनयन संस्कार को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इसे यज्ञोपवीत संस्कार भी कहते हैं, और यही वह क्षण होता है जब बालक धर्म, ज्ञान और आध्यात्मिकता की राह पर आगे बढ़ता है.
रीवा के ज्योतिषाचार्य पंडित संदीप शुक्ल बताते हैं कि यह संस्कार बालक के जीवन का नया अध्याय होता है. जब कोई माता-पिता अपने पुत्र को ज्ञान अर्जित करने के लिए गुरु के पास भेजते हैं, तो उससे पहले उसे दीक्षा दी जाती है—और इस प्रक्रिया में भिक्षा लेना अहम भूमिका निभाता है.
भिक्षा मांगने की परंपरा
अब सवाल यह उठता है कि बालक को भिक्षा क्यों मांगनी पड़ती है? और सबसे पहले मां ही उसे भिक्षा क्यों देती है?
भिक्षा मांगने का मुख्य उद्देश्य अहंकार को समाप्त करना होता है.
यह बालक को यह सिखाने के लिए किया जाता है कि जीवन में विनम्रता और धैर्य कितना जरूरी है.
मां से भिक्षा लेने का अर्थ है कि पहला अन्न जो वह ग्रहण करेगा, उसमें मां का प्रेम और आशीर्वाद समाहित होगा.
बालक जब अपनी माता से भिक्षा मांगता है, तो वह सिर्फ भोजन ही नहीं, बल्कि संस्कार, प्रेम और सहनशीलता की सीख भी प्राप्त करता है.
ब्रह्मचर्य की राह पर पहला कदम
यज्ञोपवीत संस्कार के दौरान बालक को विशेष विधियों से तैयार किया जाता है. पहले भगवान गणेश, देवी सरस्वती और माता लक्ष्मी का आह्वान किया जाता है. फिर मुंडन कर बालक को पवित्र जल से स्नान कराया जाता है. उसके बाद जनेऊ धारण कर तीन सूत्रों से बांधा जाता है. हाथ में दंड (लकड़ी) दी जाती है, जिससे संकेत मिलता है कि अब यह बालक ज्ञान और धर्म के मार्ग पर चलेगा.
यही वह क्षण होता है जब बालक गायत्री मंत्र का पाठ सीखता है और आधिकारिक रूप से ब्रह्मचारी कहलाता है. ब्राह्मणों को ज्ञान और धर्म की शिक्षा देने वाला वर्ग माना जाता है. उपनयन संस्कार के बिना कोई भी व्यक्ति आधिकारिक रूप से ‘वेदाध्यायी’ नहीं बन सकता. यही वह संस्कार है जो उसे शास्त्रों, वेदों और धर्म के गूढ़ रहस्यों को जानने के लिए पात्र बनाता है.
Rewa,Madhya Pradesh
March 08, 2025, 17:00 IST
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी, राशि-धर्म और शास्त्रों के आधार पर ज्योतिषाचार्य और आचार्यों से बात करके लिखी गई है. किसी भी घटना-दुर्घटना या लाभ-हानि महज संयोग है. ज्योतिषाचार्यों की जानकारी सर्वहित में है. बताई गई किसी भी बात का Bharat.one व्यक्तिगत समर्थन नहीं करता है.

















