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Chowk Poorana: रीवा की लोक कला चौकपूरना खास शुभ अवसरों पर बनाई जाती है, जिसका उद्देश्य देवी-देवताओं को सम्मानित करना और घर में सुख-संपत्ति लाना है.
विंध्य की कोणर प्रथा होलिका दहन के बाद बनाई जाती हैं आंगन में.
हाइलाइट्स
- चौक पूरना रीवा की लोक कला है.
- इसे शुभ अवसरों पर देवी-देवताओं के सम्मान में बनाया जाता है.
- होलिका दहन के बाद चौक पूरना अनिवार्य है.
रीवा. लोक कला चौकपूरना विशेष रूप से शुभ अवसरों पर बनाई जाती है. इसे बनाने का उद्देश्य देवी-देवताओं को अद्रान-प्रदान करना है. इसके साथ ही इसे सुख, समृद्धि, सौंदर्य और शुभता के लिए बनाया जाता है. यहां अवसर विशेष होता है, त्योहारों, अनुष्ठानों, संस्कारों और उत्सवों से संबंधित प्रतीकों को अंकित किया जाता है. चौक बनाना अधिकतर शुभ अवसरों पर अनिवार्य होता है. इस लोक कला का मानवीय भावनाओं से सीधा संबंध है, इसलिए इसे पारंपरिक रूप से बनाया जा रहा है. चौक पूरन में मांगलिक चौक, कल्याणकारी चौक, संस्कार चौक, व्रत-त्योहार चौक बनाए जाते हैं इसे घर की महिला और कर्मकांडी पुरोहित द्वारा बनाया जाता है.
रीवा के गृहिणी कविता पांडेय कहती हैं कि घर की महिला या नाउन (नाई की पत्नी) घर के आंगन को गाय के गोबर से लीपती है. उसके बाद आंगन में बड़ी-बड़ी आकृति गेंहू के आटे से बनाई जाती हैं. जो चौक पूरन का ही बड़ा आकार होता है. इसे होलिका दहन के दूसरे दिन भी बनाई जाती है, ताकि घर में मंगल का आगमन हो, होलिका दहन के साथ सब नकारात्मक प्रभाव खत्म हो गए और सभी के जीवन में सुख समृद्ध का आगमन माना जाता है.
बघेलखंड में चौक पूरना या कोडर बनाना अतिमहत्वपूर्ण माना जाता है. जब हम कोई शुभ कार्य करते हैं तो भगवान को स्थापित किया जाता है या उनका आह्वान किया जाता है तो उनके आह्वान के बाद जब विराजमान होते है तो चौक या कोडर बनाई जाती है. उसके पहले गाय के गोबर से लीपा जाता है, फिर चौक पूरा जाता है.
Rewa,Madhya Pradesh
March 13, 2025, 11:12 IST
क्या है चौक पूरना? होलिका दहन के बाद बनाना है अनिवार्य, समृद्धि भर जाएगा आंगन







