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गणगौर का उत्सव हुआ शुरू, राजस्थान में इस जगह 200 साल से भी पुरानी ईसर गणगौर की निकलती है सवारी

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Sikar News: गणगौर का त्योहार शुरू हो चुका है. राजस्थान में में शाही तरीके से आज भी गणगौर की सवारी निकाली जाती है. आपको बता दें, पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय भैरो सिंह शेखावत के पैतृक गांव खाचरियावास की गणगौर भी रा…और पढ़ें

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खाचरियावास

खाचरियावास की ईसर और गणगौर 

हाइलाइट्स

  • गणगौर का त्योहार राजस्थान में शुरू हुआ
  • खाचरियावास में 200 साल पुरानी ईसर गणगौर की सवारी निकाली जाती है
  • गणगौर की शाही सवारी दो दिन तक निकलती है

सीकर:- 16 दिन तक चलने वाला राजस्थानी संस्कृति का प्रतीक गणगौर का त्योहार शुरू हो चुका है. इस त्योहार पर महिलाएं भगवान शिव को ईसर के रूप में और माता पार्वती को गणगौर के रूप में पूजती है. 15 दिन पूजा अर्चना के बाद 16 वें दिन ईसर और गणगौर की सवारी निकाली जाती है.

गणगौर की निकाली जाती है सवारी
राजस्थान के कई बड़े शहरों में राजा महाराजाओं की परंपरा के अनुसार गणगौर की सवारी निकाली जाती है. बता दें, कि जयपुर, उदयपुर, जोधपुर, सीकर की गणगौर की सवारी बहुत प्रसिद्ध है. इसके अलावा पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय भैरो सिंह शेखावत के पैतृक गांव खाचरियावास की गणगौर भी राजस्थान में बहुत प्रसिद्ध है. यहां पर 200 साल से भी अधिक पुरानी ईसर गणगौर की प्रतिमा की सवारी निकाली जाती है.

राज परिवार ने ईसर गणगौर बनवाई थी 
आपको बता दें, कि यहां राजा महाराजाओं ने ईसर गणगौर की प्रतिमा का स्वरूप दिया था. खास बात ये है कि यहां दो दिन शाही लवाजमे के साथ गणगौर की सवारी निकाली जाती है. वहीं, यहां आज भी 200 साल पहले बनी लकड़ी की गणगौर सुरक्षित है. यहां सवारी निकालने के बाद दोनों ही प्रतिमाओं को कवर लगाकर ऊनी वस्त्रों में लपेटकर सुरक्षित रखा जाता है, जिससे इसका मूल स्वरूप खराब ना हो सके.

दो दिन निकलती है सवारी 
बता दें, कि खाचरियावास में गणगौर की शाही सवारी दो दिन निकलती है. पहले दिन गढ़ से रवाना होकर मुख्य बाजार गणगौरी चौक में ईसर गणगौर की सवारी को विराजमान किया जाता है, जहां नवविवाहिता सहित बाकी महिलाएं पूजा अर्चना करती हैं. वहीं, दूसरे दिन सुबह गढ़ से सवारी रवाना होकर चिन्हित घर-घर जाकर वापस गढ़ के सामने मैदान पर विराजमान होती हैं, जहां बोलावणी के मेला भरता है.

रियासत काल के दौरान मेड़ता से लाई गई थी प्रतिमा
आपको बता दें, कि पहले दिन लाल रंग की पोशाक धारण कर नगर भ्रमण करवाया जाता है. जिसके बाद दूसरे दिन पीली पोशाक धारण करवाकर नगर भ्रमण करवाया जाता है. यहां आज भी राजघराने की परंपरा के अनुसार शाही लवाजमे के साथ गणगौर की सवारी निकाली जाती है. वहीं ग्रामीणों ने बताया कि ईसर गणगौर की प्रतिमा रियासत काल के दौरान मेड़ता से लाई गई थी. जिसे देखने आज भी आसपास के दर्जनों गांवों के काफी संख्या में लोग शामिल होते हैं.

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी, राशि-धर्म और शास्त्रों के आधार पर ज्योतिषाचार्य और आचार्यों से बात करके लिखी गई है. किसी भी घटना-दुर्घटना या लाभ-हानि महज संयोग है. ज्योतिषाचार्यों की जानकारी सर्वहित में है. बताई गई किसी भी बात का Bharat.one व्यक्तिगत समर्थन नहीं करता है.

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