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Hajj kis par farz hai : हज हर मुसलमान पर जिंदगी में एक बार फर्ज किया गया है. इसमें मुसलमान अल्लाह के हुक्म की तामील करते हैं. लेकिन शरीयत के अनुसार, हज हर मुसलमान के लिए अनिवार्य नहीं है.
इस्लाम मे हज किन लोगों पर है फ़र्ज़ और किन लोंगो के लिए है हज न करने की छूट
हाइलाइट्स
- हज हर मुसलमान पर अनिवार्य नहीं होता.
- आर्थिक रूप से कमजोर या कर्जदार को हज से छूट है.
- इन्हें हज न करने पर गुनाह नहीं मिलेगा.
अलीगढ़. इस्लाम के पांच बुनियादी फराइज में से एक है हज, जो हर मुसलमान पर जिंदगी में एक बार फर्ज (अनिवार्य) किया गया है. बशर्ते कि वो इसके लिए साहिबे हैसियत (सामर्थ्य) रखता हो. हज एक ऐसा इबादतगुजार सफर है जो मक्का की जियारत के लिए किया जाता है. इसमें मुसलमान अल्लाह के हुक्म की तामील करते हैं. हालांकि हज हर मुसलमान पर फर्ज नहीं होता. कुछ खास शर्तें हैं, जिनके पूरे होने पर ही ये फर्ज बनता है. कुछ हालात ऐसे भी हैं जिनमें शरई तौर पर हज न करना जायज होता है. इस रिपोर्ट में हम जानेंगे कि कौन-कौन लोग हज करने के लिए पाबंद हैं, किन हालात में हज माफ है, और अगर आप खुद हज पर जाना चाहते हैं तो इसके लिए क्या-क्या जरूरी तैयारी करनी चाहिए.
घर का खर्चा देकर जाए
हज ट्रेनर मोहम्मद शमशाद अहमद खान बताते हैं कि हज उन लोगों पर फर्ज है, जो साहिबे हैसियत हो. पैसे से मजबूत हो और हज का पूरा खर्चा आसानी से उठा सके. इसके साथ अपने घर का पूरा खर्चा भी देकर जाए. ऐसे लोगों पर हज फर्ज है. जो पैसे से मजबूर हों या कर्जदार हों, उनके लिए हज अनिवार्य नहीं है. हज पर जाने से पहले आपको अपना सारा कर्ज अदा करना होता है. अगर आप पर कर्ज है तो आप हज पर जाने योग्य नहीं है.
नहीं होगा गुनाह
हज ट्रेनर मोहम्मद शमशाद खान कहते हैं कि हज करने का खर्चा इस समय लगभग 34 हजार रुपए आता है. अगर किसी की माली हालत ठीक नहीं है, पैसे से कमजोर है या कर्ज में दबा हुआ है तो ऐसी स्थिति में वो हज पर जाने के लिए योग्य नहीं होता. उसे इस मजबूरी के तहत शरीयत कानून के हिसाब से हज पर जाने की छूट दी गई है. ऐसी स्थिति में वो हज का सबब तो नहीं पा सकता लेकिन हज न करने पर उसको गुनाह भी नहीं मिलेगा.

















