Mahabharat Story: महाभारत सिर्फ एक युद्ध नहीं था, बल्कि ऐसा समय था जब हर दिन कोई ना कोई बड़ा मोड़ सामने आता था. जिस तरह आज हम ग्रहण को लेकर तरह-तरह की बातें सुनते हैं, उसी तरह उस दौर में भी ग्रहण को लेकर कई तरह के संकेत समझे जाते थे. महाभारत के युद्ध में तो एक ऐसा मौका भी आया, जब अचानक लगे सूर्य ग्रहण जैसे दृश्य ने अर्जुन की जान बचा ली थी. सुनने में यह किसी फिल्मी कहानी जैसा लगता है, लेकिन महाभारत के 14वें दिन घटी यह घटना असल में इतनी रोमांचक थी कि इसे समझते हुए आज भी रोमांच हो जाता है. कुरुक्षेत्र की रणभूमि में उस दिन हालात बेहद तनावपूर्ण थे. अर्जुन अपने बेटे अभिमन्यु की दुखद मौत से टूट चुके थे और उन्होंने ऐसी प्रतिज्ञा ले ली थी जिसे पूरा करना लगभग नामुमकिन लग रहा था. दूसरी ओर कौरव सेना पूरी तैयारी में थी कि इस बार अर्जुन अपनी बात पर टिक नहीं पाएंगे. जैसे-जैसे दिन बीत रहा था, हवा में बेचैनी बढ़ती जा रही थी. हर कोई जानना चाहता था कि क्या अर्जुन सूर्य ढलने से पहले अपना लक्ष्य पूरा कर पाएंगे या नहीं. इसी तनाव, डर और उम्मीद के बीच एक ऐसा पल आया जिसने युद्ध की दिशा बदल दी. कुछ क्षणों के लिए आसमान अंधेरा हो गया, माहौल बदल गया और कौरव सेना को लगा कि सब खत्म हो चुका है, लेकिन असल खेल तो यहीं से शुरू हुआ था. यह पूरा किस्सा भगवान कृष्ण की धीर-गंभीर रणनीति, अर्जुन की निडरता और समय की अद्भुत चाल का मिश्रण था. आइए इस पूरे वाकये को आसान भाषा में समझते हैं.

अर्जुन जयद्रथ वध
महाभारत का 14वां दिन और अर्जुन की प्रतिज्ञा
14वें दिन की शुरुआत ही एक भारी माहौल के साथ हुई. पिछले दिन अभिमन्यु को जिस तरह घेरकर मारा गया था, उसने अर्जुन को भीतर तक झकझोर दिया था. अपने बेटे की ऐसी मौत देखकर अर्जुन का दर्द गुस्से में बदल गया. उन्होंने जगह-जगह खड़े सेनापतियों, सैनिकों और अपने साथियों के सामने घोषणा कर दी कि वे अगले दिन सूर्यास्त से पहले जयद्रथ को मारेंगे. इस घोषणा ने पूरे युद्ध को एक नई दिशा दे दी. अर्जुन की प्रतिज्ञा सुनकर कौरवों के चेहरे खिल उठे, क्योंकि उन्हें लगा कि यह काम नामुमकिन है. जयद्रथ, जो अभिमन्यु को मारने की साजिश में शामिल था, उसी दिन से कौरवों की सबसे बड़ी उम्मीद बन गया. दुर्योधन ने पूरी सेना को आदेश दिया कि किसी भी हाल में जयद्रथ तक अर्जुन को पहुंचने न दिया जाए. सेना ने चारों ओर मजबूत घेरा बना लिया. ऐसे योद्धा आगे लगाए गए जिनसे पार पाना बेहद कठिन था. दिन बीतता रहा, लड़ाई चलती रही, पर अर्जुन को बार-बार दूसरी दिशा में भटका दिया जाता था. समय तेजी से गुजर रहा था और ऐसा लग रहा था कि अर्जुन की प्रतिज्ञा अब टूट जाएगी.
जब लगा सूर्यास्त हो गया-सूर्य ग्रहण जैसा दृश्य
जैसे-जैसे सूर्य ढलने का समय नजदीक आता गया, अर्जुन की चिंता बढ़ती गई. उनका मन भीतर से टूटने लगा था, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि आज सब खत्म हो जाएगा. उधर कौरवों को यकीन था कि अब अर्जुन हार मान लेंगे और अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार अग्नि में समा जाएंगे. तभी अचानक आसमान में अजीब-सा अंधेरा फैलने लगा. ऐसा लगा जैसे सूर्य एकदम गायब हो गया हो. चारों ओर का उजाला खत्म होकर माहौल धुंधला और डरावना हो गया. कौरवों को लगा कि सूर्यास्त हो चुका है.
जयद्रथ खुशी से बाहर निकल आया, क्योंकि उसे लगा कि अर्जुन हार चुके हैं. वही पल महाभारत के इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ बन गया.
असल में यह कोई असली सूर्य ग्रहण नहीं था, बल्कि भगवान कृष्ण की अद्भुत लीला थी. उन्होंने सुदर्शन चक्र से सूर्य को ढक दिया और ऐसा दृश्य बनाया कि सबको सूर्यास्त होने का भ्रम हो गया.

अर्जुन जयद्रथ वध
जब कृष्ण ने हटाया चक्र और अर्जुन ने चलाया बाण
जैसे ही जयद्रथ छिपने वाली जगह से बाहर आया, कृष्ण ने तुरंत सुदर्शन चक्र हटा लिया. पलभर में सूर्य फिर से चमक उठा और पूरा मैदान रोशनी से भर गया.
कौरव सैनिक हैरान रह गए. उन्हें समझ आया कि यह सब कृष्ण की योजना थी, लेकिन अब कुछ करने का समय नहीं बचा था. अर्जुन बिल्कुल तैयार खड़े थे. उन्होंने तुरंत अपना घातक बाण चलाया और जयद्रथ का वध कर दिया.
इस तरह अर्जुन ने न सिर्फ अपनी प्रतिज्ञा पूरी की, बल्कि युद्ध की दिशा भी पलट दी. इस घटना ने पांडवों को बड़ी ताकत दी और कौरव सेना का मनोबल गिरा दिया. 14वें दिन की यह घटना महाभारत के सबसे रोमांचक और प्रतीकात्मक वाकयों में से एक बन गई.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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