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मोक्षदा एकादशी 2025: मोक्षदा एकादशी की तिथि को लेकर फैली उलझन दूर हो गई है. धर्मसिंधु और मान्य पंचांगों के अनुसार इस वर्ष मोक्षदा एकादशी 1 दिसंबर यानी आज ही मनाई जाएगी. कथावाचक पंडित रमेश चंद्र शास्त्री ने बताया कि एकादशी तिथि 1 दिसंबर को सुबह तक विद्यमान रहेगी और यह अगले दिन के नियमों के अंतर्गत नहीं आती. इस दिन गीता पाठ, गीता दान और दान-पुण्य का विशेष महत्व है. यह तिथि मोक्ष और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति देने वाली मानी गई है.
करौली. मार्गशीर्ष माह का महत्व हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है और इसी माह की सबसे प्रमुख तिथि ‘मोक्षदा एकादशी’ को लेकर इस बार लोगों के मन में उलझन की स्थिति देखी जा रही है. कई लोग असमंजस में हैं कि मोक्षदा एकादशी 1 दिसंबर को है या 2 दिसंबर को. लेकिन शास्त्रों, धर्म सिंधु और मान्य पंचांगों के अनुसार इस वर्ष मोक्षदा एकादशी 1 दिसंबर, सोमवार के दिन ही मनाई जाएगी.
करौली के प्रसिद्ध कथावाचक पंडित रमेश चंद्र शास्त्री ने बताया कि एकादशी तिथि 1 दिसंबर को प्रातः 29 घड़ी 33 पल तक रहेगी. शास्त्री जी का कहना है कि यदि एकादशी 45 घड़ी से अधिक समय तक जारी रहती है तो अगले दिन वैष्णव पद्धति के अनुसार व्रत करने का प्रावधान होता है. साथ ही यदि एकादशी रात के बारह बजे के बाद अतिक्रमण करती है तो अगले दिन व्रत का विधान स्वीकार्य होता है. लेकिन इस बार ऐसा नहीं है, इसलिए धर्मसिंधु के अनुसार मोक्षदा एकादशी 1 दिसंबर, सोमवार को ही सम्पूर्ण शुभ फल प्रदान करने वाली मानी जाएगी.
दान और पुण्य का है विशेष महत्व
पंडित रमेश चंद्र शास्त्री के अनुसार, जो भी व्यक्ति इस दिन विधि-विधान से व्रत करता है, उसके लिए बैकुंठ धाम के द्वार खुल जाते हैं. यह व्रत केवल सांसारिक सुख और सफलता ही नहीं देता बल्कि व्यक्ति को भगवान के नजदीक पहुंचाने का मार्ग भी प्रदान करता है. मोक्ष प्रदान करने वाली इस तिथि का अर्थ ही है वह एकादशी जो जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाने वाली है. मोक्षदा एकादशी के दिन दान और पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है. इस दिन दान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है तथा सभी दुखों और संकटों का निवारण होता है. शास्त्रों में उल्लेख है कि दान और भक्ति के द्वारा ही मनुष्य अपने जीवन को पवित्र और सार्थक बना सकता है.
आज करें ये शुभ कार्य
मोक्षदा एकादशी के अवसर पर प्रत्येक व्यक्ति को गीता का श्रवण, गीता पाठ, गीता का दान और उसका मनन अवश्य करना चाहिए. धार्मिक मान्यताओं में इस दिन गीता का पाठ सबसे श्रेष्ठ माना गया है. इसी दिन भगवद्गीता का प्राकट्य हुआ था, इसलिए यह तिथि गीता जयंती के रूप में भी मनाई जाती है. इस व्रत को सभी व्रतों में उत्तम बताया गया है और इसे करने से मानव जीवन की सार्थकता सिद्ध होती है. जो भी व्यक्ति इस दिव्य व्रत को श्रद्धापूर्वक करता है, वह आने वाले समय में परम शांति और दिव्यता की अनुभूति अवश्य प्राप्त करता है.
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