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Bhaum Pradosh Vrat Katha: आज देशभर में भौम प्रदोष तिथि का व्रत किया जा रहा है. इस दिन व्रत रखकर सुबह और प्रदोष काल में शिवजी की पूजा अर्चना की जाती है और कथा का पाठ किया जाता है. भगवान शिव प्रदोष काल में भक्तों के पाप नष्ट कर उनके कर्म-बंधन काट देते हैं. कथा के श्रवण मात्र से शिवलिंग पूजा का फल प्राप्त होता है और व्रत कथा पाप-विमोचन का माध्यम भी है. यहां पढ़ें भौम प्रदोष व्रत की कथा…
Bhaum Pradosh Vrat Katha: प्रदोष व्रत हर मास कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को आता है, पर जब यह मंगलवार को पड़े तो इसे भौम प्रदोष कहते हैं. भौम प्रदोष तिथि के दिन व्रत रखकर प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा अर्चना करके कथा पढ़ने व सुनने का विशेष महत्व है. मान्यता है कि भौम प्रदोष व्रत की की कथा ना केवल आध्यात्मिक उत्थान देती है, बल्कि जीवन के कठिन संकटों को भी दूर करती है. इस कथा सुनने व पढ़ने मात्र से से मंगल दोष, कर्ज, मुकदमेबाजी, दुर्घटनाएं और शत्रु बाधाएं कम होती हैं. साथ ही कुंडली के शनि-मंगल विवाद शांत होते हैं और पाप क्षय होता है. यहां पढ़ें भौम प्रदोष व्रत की कथा…
भौम प्रदोष व्रत की कथा | Bhaum Pradosh Vrat Katha In Hindi
एक समय की बात है. एक नगर में एक वृद्धा रहती थी, उसका एक ही पुत्र था. वृद्धा की हनुमानजी पर गहरी आस्था थी. वह प्रत्येक मंगलवार को नियमपूर्वक व्रत रखकर हनुमानजी की आराधना करती थी. एक बार हनुमानजी ने अपनी भक्तिनी उस वृद्ध महिला की श्रद्धा का परीक्षण करने का विचार किया.
हनुमानजी साधु का वेश धारण कर वृद्धा के घर गए और पुकारने लगे- है कोई हनुमान भक्त! जो हमारी इच्छा पूर्ण करे? आवाज उस वृद्धा के कान में पड़ी, पुकार सुन वृद्धा जल्दी से बाहर आई और साधु को प्रणाम कर बोली- आज्ञा महाराज! हनुमान वेशधारी साधु बोले- मैं भूखा हूं, भोजन करूंगा, तुम थोड़ी जमीन लीप दो. वृद्धा दुविधा में पड़ गई. अंतत: हाथ जोड़कर बोली- महाराज! लीपने और मिट्टी खोदने के अतिरिक्त आप कोई दूसरी आज्ञा दें, मैं अवश्य पूर्ण करूंगी.
साधु ने तीन बार प्रतिज्ञा कराने के बाद कहा- तू अपने बेटे को बुला. मैं उसकी पीठ पर आग जलाकर भोजन बनाऊंगा. यह सुनकर वृद्धा घबरा गई, लेकिन वह प्रतिज्ञाबद्ध थी. उसने अपने पुत्र को बुलाकर साधु को सौंप दिया. वेशधारी साधु हनुमानजी ने वृद्धा के हाथों से ही उसके पुत्र को पेट के बल लिटवाया और उसकी पीठ पर आग जलवाई. आग जलाकर दु:खी मन से वृद्धा अपने घर में चली गई.
इधर भोजन बनाकर साधु ने वृद्धा को बुलाकर कहा- उनका भोजन बन गया है. तुम अपने पुत्र को पुकारो ताकि वह भी आकर भोग लगा ले. इस पर वृद्धा बोली- उसका नाम लेकर मुझे और कष्ट न दें. लेकिन जब साधु महाराज नहीं माने तो वृद्धा ने अपने पुत्र को आवाज लगाई. वह अपनी मां के पास आ गया. अपने पुत्र को जीवित देख वृद्धा को बहुत आश्चर्य हुआ और वह साधु के चरणों में गिर पड़ी. तब हनुमानजी अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और वृद्धा को भक्ति का आशीर्वाद दिया.
हर हर महादेव !
बजरंगबली की जय !







