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झारखंड स्वाद, परंपरा और पौष्टिकता के मामले में किसी से पीछे नहीं है. यहां मोटे अनाज, चावल और दालों से तैयार होने वाले व्यंजनों की विविधता देशभर में अपनी खास पहचान रखती है.
भारत के हर राज्य की अपनी खास खानपान संस्कृति है, और झारखंड भी स्वाद, परंपरा और पौष्टिकता के मामले में किसी से पीछे नहीं है. यहां मोटे अनाज, चावल और दालों से तैयार होने वाले व्यंजनों की विविधता देशभर में अपनी खास पहचान रखती है. इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में से एक है राइस डूम्बू, जिसे झारखंड के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में बड़े चाव से खाया जाता है. यह व्यंजन न सिर्फ स्वाद में अनोखा है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी बेहद फायदेमंद माना जाता है.
यह व्यंजन उतना ही सरल है जितना स्वादिष्ट. राइस डूम्बू बनाने के लिए सबसे पहले चावल को उसका पीसकर आटा तैयार किया जाता है. फिर उसमें गर्म पानी डालकर नरम आटा गूंथा जाता है. इसके बाद नारियल का बुरादा और गुड़ मिलाकर मीठा मिश्रण तैयार किया जाता है, जो डूम्बू का असली स्वाद बनाता है. अब चावल के आटे की लोई बनाकर उसमें गुड़–नारियल का यह मिश्रण भरा जाता है और लोई को गोल आकार दिया जाता है. इन गोल डूम्बू को इडली के सांचे में रखकर लगभग 15 मिनट तक भाप में पकाया जाता है. भाप में पकने के बाद यह व्यंजन प्राकृतिक मिठास और मुलायम बनावट के साथ खाने के लिए तैयार हो जाता है.
बिना मसाले-तेल और हेल्दी व्यंजन
राइस डूम्बू की सबसे खास बात यह है कि इसे बनाने में न तो तेल का इस्तेमाल होता है और न ही किसी तरह का मसाला. गुड़ और नारियल जैसे प्राकृतिक सामग्री इसे न सिर्फ लजीज बनाती है, बल्कि पौष्टिक भी. यह बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के लिए बेहद हल्का और सुपाच्य भोजन है. झारखंड के पलामू जिले में कई सरकारी आयोजनों में मोटे अनाज से बने व्यंजनों के साथ राइस डूम्बू को भी परोसा जाता है, जिससे इसकी लोकप्रियता और बढ़ती जा रही है.
गांव से निकलकर जिला कार्यालय तक पहुंचा स्वाद
चैनपुर प्रखंड में बनने वाला यह पारंपरिक व्यंजन अब केवल गांव-देहात तक सीमित नहीं रहा. “दीदी चिकन चैनपुर” के माध्यम से जब राइस डूम्बू जिला कार्यालय या अधिकारियों तक पहुंचता है, तो वे भी इसके स्वाद के कायल हो जाते हैं. इसकी प्राकृतिक स्वाद, सुगंध और स्वास्थ्यवर्धक गुण इसे झारखंड के पारंपरिक व्यंजनों में खास स्थान देते हैं.
आदिवासी समुदाय का प्रिय व्यंजन
राइस डूम्बू आदिवासी समुदाय का बेहद पसंदीदा व्यंजन माना जाता है. यह न सिर्फ त्योहारों और विशेष मौकों पर बनाया जाता है, बल्कि रोजमर्रा के भोजन में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है. यह व्यंजन झारखंड की सांस्कृतिक विरासत, परंपरा और प्राकृतिक जीवन शैली का सुंदर उदाहरण है, जो आज भी लोगों के स्वाद और दिल दोनों में अपनी जगह बनाए हुए है.
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