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Satna News: स्थानीय किस्मों में पाहिन, पाम, सिंघी जैसी मछलियां खासतौर पर पसंद की जाती हैं. इनमें ओमेगा-3 फैटी एसिड, विटामिन-डी, कैल्शियम और काफी मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है, जो सर्दियों में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में सहायक है.
सतना. कड़ाके की ठंड पड़ते ही बघेलखंड के ग्रामीण इलाकों में खानपान का एक खास रंग देखने को मिलता है. यहां के गांवों में आज भी सर्दियों के मौसम में कुछ चुनिंदा स्थानीय मछलियां बड़े चाव से खाई जाती हैं. खास बात यह है कि समय बदला, खानपान के ट्रेंड बदले लेकिन इन देसी मछलियों का महत्व न तो कम हुआ और न ही इनका स्वाद. चिकन और मटन पसंद करने वाले कई नॉनवेज लवर्स भी अगर ठंड में बिना ज्यादा कांटे वाली ये मछलियां मिल जाएं, तो इन्हें खाने से पीछे नहीं हटते.
मछली को हमेशा से गर्म तासीर वाला आहार माना जाता है. सर्दियों में जब शरीर को अतिरिक्त ऊर्जा और गर्माहट की जरूरत होती है, तब ये मछलियां ग्रामीण क्षेत्रों में गर्मी का प्राकृतिक विकल्प बन जाती हैं. स्थानीय किस्मों में पाम, पाहिन, सिंघी जैसी मछलियां विशेष रूप से पसंद की जाती हैं. इन मछलियों में ओमेगा-3 फैटी एसिड, विटामिन-डी, कैल्शियम और उच्च मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है, जो ठंड के मौसम में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में मदद करता है.
सर्दियों में त्वचा का रूखापन और जोड़ों का दर्द आम समस्या है. मछली में मौजूद ओमेगा-3 फैटी एसिड त्वचा को नमी देने के साथ-साथ गठिया और सूजन जैसी समस्याओं में भी राहत देता है. Bharat.one से बातचीत में सतना के पशु चिकित्सक डॉ बृहस्पति भारती ने बताया कि मछली फेफड़ों में हवा के प्रवाह को बेहतर बनाती है, जिससे सर्दी-खांसी और अन्य श्वसन संबंधी बीमारियों का खतरा कम होता है. फिश में एनिमल प्रोटीन की मात्रा चिकन और मटन की तुलना में अधिक होती है, जो शरीर को ताकत देता है.
तालाब-नदियों से सीधा थाली तक
बघेलखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में इन मछलियों की उपलब्धता एक बड़ा कारण है कि लोग आज भी इन्हें प्राथमिकता देते हैं. गांव के लोग नालों, नदियों और तालाबों से ताजी मछलियां पकड़कर सीधे अपने भोजन में शामिल करते हैं. ताजी मछली का स्वाद अलग ही होता है और यह बाजार की तुलना में अधिक किफायती भी पड़ती है. कई जगहों पर तो ये मछलियां सब्जियों में धनिया-मिर्च की तरह आसानी से या लगभग मुफ्त में मिल जाती हैं.
कम कांटे और ज्यादा स्वाद
ग्रामीण इलाकों में आज भी ऐसे लोग हैं, जो ज्यादा मीट नहीं खाते लेकिन कम कांटे या एक कांटे वाली मछलियां जरूर पसंद करते हैं. इसी वजह से रोहू के मुकाबले पाम और पाहिन जैसी मछलियों की मांग बनी रहती है. इनका स्वाद हल्का मीठा और मिट्टी जैसा (अर्थी फ्लेवर) होता है, जो पारंपरिक देसी करी और तले हुए व्यंजनों में खास पसंद किया जाता है.
ठंड के मौसम में सेहत का सहारा
बघेलखंड में मछली केवल भोजन नहीं बल्कि सामाजिक मेलजोल का भी अहम हिस्सा है. पीढ़ियों से चले आ रहे इनके पारंपरिक पकाने के तरीके आज भी गांवों में जीवित हैं. यही कारण है कि ठंड के मौसम में ये देसी मछलियां न सिर्फ सेहत का सहारा बनती हैं बल्कि बघेलखंड की पहचान और परंपरा को भी जीवित रखती हैं.
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राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.
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