हरिद्वार: हरिद्वार से शुरू होने वाली शारदीय कावड़ यात्रा में अब कुछ ही समय बाकी रह गया है. देश के अलग-अलग राज्यों से शिव भक्त हरिद्वार आते हैं और अपने कंधों पर गंगाजल उठाकर अपने गंतव्य को रवाना हो जाते हैं. भगवान शिव के निमित्त की जाने वाली कावड़ यात्रा, तलवार के धार पर चलने के बराबर होती है. हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि यदि कावड़ यात्रा नियम अनुसार नहीं की जाती तो उसका विपरीत फल मिलता है और महादेव के क्रोध का सामना करना पड़ सकता है.
कावड़ यात्रा एक चलता फिरता मंदिर होता है. शारदीय कावड़ यात्रा फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होती है जिसे कंधों पर उठाने के नियम, शिव महापुराण, स्कंद पुराण आदि धार्मिक ग्रंथो में बताया गया हैं. चलिए विस्तार से समझते हैं कावड़ उठाने के नियम…
क्या है कावड़ उठाने के नियम
कावड़ यात्रा के नियम की ज्यादा जानकारी देते हुए पंडित श्रीधर शास्त्री बताते हैं कि शिव पुराण और स्कंद पुराण आदि कई ग्रंथों में कावड़ उठाने के नियमों का उल्लेख किया गया है. कावड़ यात्रा शुरू करने से पूर्व पवित्र नदी गंगा आदि में स्नान करके साफ सुथरे वस्त्रों को धारण करें. स्नान करते हुए भोलेनाथ के मंत्रों जैसे “ॐ नमः शिवाय” या अन्य मंत्र का मन ही मन जाप करते रहें. वह बताते हैं कि कावड़ उठाने से पहले पतित पावनी मां गंगा की पूजा अर्चना और हाथ में पवित्र गंगाजल लेकर यात्रा का संकल्प करें. यदि बिना संकल्प के कावड़ यात्रा की जाती है, तो उसका कोई भी फल नहीं मिलता है.
क्यों खंडित हो जाती है कांवड
कावड़ यात्रा करते हुए कावड़ को एक कंधे से दूसरे कंधे पर सिर के ऊपर से ना लेकर जाएं. ऐसा करना करने से यात्रा को खंडित माना जाता है. साथ ही कावड़ को नीचे भूमि पर नहीं रखना चाहिए. इससे भी कावड़ खंडित हो जाती है. यदि कावड़ को एक कंधे से दूसरे कंधे पर रखना हो, तो आगे की तरफ से घूम कर रखें. साथ ही यदि कावड़ को रखना हो तो किसी साफ सुथरी जगह ऊंचे स्थान यानी स्टैंड पेड़ आदि पर ही रखें इससे कावड़ खंडित नहीं होती है और यात्रा का संपूर्ण फल मिलता है.
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