Mahakaleshwar Bhasma Aarti : सुबह के चार बजे उज्जैन की गलियों में हल्की ठंड, मंदिर की ओर बढ़ते कदम और हर चेहरे पर एक अजीब-सी शांति. 4 फरवरी 2026 को ज्योतिर्लिंग भगवान श्री महाकालेश्वर जी की भस्म आरती का दिन कुछ अलग ही महसूस हुआ. यह सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि ऐसा अनुभव था जो श्रद्धा, आस्था और आत्मिक सुकून को एक साथ छू जाता है. पहली बार आए श्रद्धालु हों या वर्षों से आने वाले भक्त हर कोई उसी भाव में डूबा दिखा. महाकाल के द्वार पर खड़े होकर यह एहसास होता है कि समय सचमुच यहीं आकर रुक जाता है. यही महाकाल की पहचान है कालों के काल.
भस्म आरती: आस्था और परंपरा का जीवंत संगम
भस्म आरती महाकालेश्वर मंदिर की सबसे विशिष्ट पहचान मानी जाती है. तड़के ब्रह्म मुहूर्त में होने वाली यह आरती शिव के वैराग्य और जीवन के क्षणभंगुर सत्य का प्रतीक है. 4 फरवरी 2026 को हुई आरती में पंचामृत स्नान, चंदन, रुद्राक्ष और पवित्र भस्म से किया गया श्रृंगार विशेष आकर्षण का केंद्र रहा.
मंदिर परिसर में शंखनाद, डमरू की ध्वनि और वैदिक मंत्रों का उच्चारण माहौल को गहराई से आध्यात्मिक बना देता है. कई श्रद्धालु बताते हैं कि भस्म आरती के बाद मन अपने आप शांत हो जाता है, जैसे भीतर कुछ बदल गया हो.
पहली बार आए श्रद्धालुओं की भावना
दिल्ली से आए एक युवा दंपती ने कहा, “हमने वीडियो में बहुत देखा था, लेकिन सामने से भस्म आरती देखना बिल्कुल अलग अनुभव है.” वहीं, उज्जैन के स्थानीय पुजारी बताते हैं कि माघ महीने में आरती का महत्व और बढ़ जाता है.
व्यवस्था और अनुशासन
4 फरवरी 2026 को मंदिर प्रशासन द्वारा दर्शन व्यवस्था सुचारु रही. ऑनलाइन पंजीकरण, समयबद्ध प्रवेश और सुरक्षा व्यवस्था ने श्रद्धालुओं को सहज अनुभव दिया. यह दिखाता है कि परंपरा और आधुनिक व्यवस्था साथ-साथ चल सकती है.
महाकाल: आस्था से आगे एक अनुभव
महाकालेश्वर सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि ऐसा भाव है जो व्यक्ति को भीतर से जोड़ता है. भस्म आरती में शामिल होना कई लोगों के लिए जीवन की “बकेट लिस्ट” का हिस्सा होता है. कुछ लोग हर साल आते हैं, कुछ मन्नत पूरी होने पर, और कुछ सिर्फ उस शांति की तलाश में जो कहीं और नहीं मिलती.







