इस भभूति में सुख, होली के बाद घर लाना शुभ, लेकिन ये वाला काम ठीक नहीं, जानें
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फरीदाबाद-बल्लभगढ़ में होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, आस्था और परंपरा का प्रतीक है. होलिका दहन के बाद लोग भस्म घर लाकर उसे शुभ मानते हैं. मान्यता है कि इससे नकारात्मकता दूर होती है और सुख-शांति बनी रहती है. ब्रज की छाप लिए यहां की होली आज भी श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाई जाती है. Bharat.one से बात करते हुए पंडित उमाचंद मिश्रा बताते हैं कि होलिका दहन के बाद लोग भभूति (भस्म) अपने घर लाते हैं. कुछ जगह लोग जलती लकड़ी भी उठा लाते हैं, लेकिन लकड़ी लाने का कोई धार्मिक आधार नहीं है.
फरीदाबाद. दिल्ली से सटे बल्लभगढ़ और फरीदाबाद हरियाणा में हैं, लेकिन यहां की होली में आपको ब्रज की पूरी छाप दिखेगी. गलियों में फाग गूंजती है मंदिरों में रंग और गुलाल उड़ता है. लोग पूरी श्रद्धा के साथ पारंपरिक तरीके से होली मनाते हैं. यहां होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं है, ये आस्था और परंपरा से गहरा जुड़ा मौका है. खास बात ये है कि होलिका दहन के बाद की एक रस्म को लोग बहुत मानते हैं. Bharat.one से बात करते हुए पंडित उमाचंद मिश्रा ने बताया कि होलिका दहन के बाद लोग वहां से भभूति यानी भस्म अपने घर लाते हैं. कुछ जगह लोग जलती लकड़ी भी उठा लाते हैं, लेकिन पंडित जी साफ कहते हैं कि लकड़ी लाने का कोई धार्मिक आधार नहीं है. असली महत्त्व उस भस्म का है जो होलिका दहन के बाद बचती है.
लोग मानते हैं कि होलिका दहन की भस्म में पॉजिटिव एनर्जी होती है. इसे घर के चारों कोनों में हल्का-सा छिड़क दें तो नकारात्मकता दूर रहती है और घर में सुख-शांति बनी रहती है. कई लोग इस भस्म को लाल कपड़े में बांधकर संभालकर रखते हैं. कहते हैं कि इससे वास्तु दोष भी कम होता है और घर का माहौल अच्छा बना रहता है. कुछ लोग तो माथे पर भस्म का टीका भी लगाते हैं. मान्यता है कि इससे मन शांत रहता है और बुरी नजर नहीं लगती. यही भस्म अगले दिन धुलेंडी पर भी काम आती है. पहले लोग इसी राख से एक-दूसरे को हल्का सा टीका लगाकर होली की शुभकामनाएं देते थे, फिर रंग और गुलाल की होली शुरू होती थी.
पंडित उमाचंद मिश्रा बताते हैं कि बल्लभगढ़ और फरीदाबाद के कई परिवार आज भी ये परंपरा निभाते हैं. घर के बुजुर्ग बच्चों को समझाते हैं कि ये सिर्फ राख नहीं ये आशीर्वाद है. पूरे साल घर में ये भस्म रखना शुभ माना जाता है. जब भी कोई नया काम शुरू होता है लोग थोड़ा सा भस्म माथे पर लगाकर भगवान को याद करते हैं. इस साल ग्रहण पड़ने की वजह से होली 4 मार्च को मनाई जाएगी. पंडित उमाचंद मिश्रा का कहना है कि ग्रहण के कारण तारीख बदली है, इसलिए लोग शुभ मुहूर्त देखकर ही होलिका दहन करें. वे सलाह देते हैं कि केमिकल वाले रंगों की जगह फूलों की होली खेलें. मंदिरों में भी अब फूलों की होली का चलन बढ़ गया है, इससे न पर्यावरण बिगड़ता है न त्वचा को कोई नुकसान होता है.
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