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भगवान राम के तीर से उत्पन्न हुई थी ये पावन नदी, जानिए इससे जुड़ी धर्मिक मान्यताएं


संजय कुमार/बक्सर: जिले में रामरेखा घाट नाम से गंगा किनारे एक पौराणिक घाट है, जहां त्योहार के दिन लाखों लोग स्नान करते हैं. इस घाट की विशेषता भगवान राम से जुड़ी है. इस संबंध में रामेश्वर नाथ मंदिर के पुजारी का कहना है कि वैसे तो बक्सर को लघु काशी कहा जाता है, क्योंकि काशी के बाद सिर्फ बक्सर में ही पतित पावनी गंगा उत्तरायणी बहती है.

काशी की तर्ज पर यहां भी अनेक घाट हैं, लेकिन सभी घाटों में रामरेखा घाट अति महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध है. इस घाट को लेकर मान्यता है कि राक्षसों के संहार के बाद भगवान राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ इसी घाट पर गंगा में स्नान किए थे. उन्होंने बताया कि यह धरती महर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि रही है.

भगवान राम आए थे बक्सर
उन्होंने ने बताया कि त्रेतायुग में जब यहां 88 हजार ऋषि मुनियों के साथ महर्षि विश्वामित्र यज्ञ कर रहे थे, तो रावण के खानदान से ताल्लुक रखने वाली राक्षसी ताड़का न केवल ऋषियों को परेशान करती थी, बल्कि यज्ञ में जानवरों के मांस व हड्डियां फेंक कर धार्मिक अनुष्ठान को भ्रष्ट कर देती थी.इसके बाद राक्षसों के कृत्यों से तंग आकर महर्षि विश्वामित्र अयोध्या नगरी चले गए और वहां से राजा दशरथ के यहां जन्मे भगवान विष्णु के अवतार श्री राम और लक्ष्मण को अपने साथ मांग कर बक्सर लाए. वहीं भगवान राम यहां पहुंचकर अपनी निगरानी में ऋषियों के यज्ञ को सफलता पूर्वक सम्पन्न कराया और राक्षसी ताड़का के साथ सुबाहु सहित कई राक्षसों का वध किया था.

भगवान राम ने घाट पर खींची थी लंबी रेखा
पंडित जी ने बताया कि ताड़का का वध करने से भगवान राम और लक्ष्मण पर ब्रह्म दोष लगने लगा. तभी महर्षि विश्वामित्र के कहने पर इस दोष से मुक्ति के लिए गंगा किनारे भगवान राम ने स्वयं अपने हाथों से शिवलिंग की स्थापना की थी. जिसका नाम आज रामेश्वरनाथ शिवलिंग है. कहा जाता है कि जब भगवान राम यहां से जाने लगे तो उनके पीछे-पीछे रामेश्वरनाथ यानि भगवान शिव भी चल दिए. जिसके बाद श्री राम ने उनसे बक्सर में ही रहने की विनती की और शिवलिंग पर हाथ से दबाया, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण शिवलिंग पर 3 अंगुलियों के निशान हैं.

कहा जाता है कि ये निशान भगवान राम के अंगुलियों के हैं. वहीं, इसके बाद गंगा किनारे घाट पर भगवान ने एक रेखा खींच दी थी, ताकि शिव दोबारा इस रेखा को पार कर उनके पीछे न आए और फिर यहीं पर महर्षि विश्वामित्र, अनुज लक्ष्मण सहित भगवान राम स्वयं गंगा में स्नान कर जनकपुर में आयोजित सीता स्वयंवर में शामिल होने के लिए प्रस्थान कर गए थे. तभी से इस घाट का नाम रामरेखा घाट पड़ा.

इस घाट पर स्नान करने का है विशेष महत्व
रामरेखा घाट पर स्नान करने का है विशेष महत्व उन्होंने बताया कि इस घाट से सनातनी लोगों का विशेष आस्था है. यही कारण है कि प्रतिदिन यहां स्नान के लिए भीड़ लगी रहती है. खासकर त्योहार के मौके पर लाखों की भीड़ उमड़ती है. मान्यता है कि रामरेखा घाट पर स्नान करने वालों के सारे पाप कट जाते है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है.

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