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Mahabharat Katha: कौन था दुर्योधन का वह एक भ्राता, जिसने युद्ध में दिया पांडवों का साथ, कौरवों का था 101वां भाई

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महाभारत में हस्तिनापुर राजघराने से जुड़े कई रोचक तथ्य पढ़ने को मिलते हैं. धृतराष्ट्र और गांधारी के 100 पुत्रों की कथा के बारे में अधिकतर लोगों को पता है, जो कौरव के नाम से भी जाने जाते हैं. धृतराष्ट्र के बड़े पुत्र दुर्योधन और उसके भाई दु:शासन का नाम लगभग सबको पता है, लेकिन बाकी भाइयों के बारे में कम ही जानकारी होगी. दुर्योधन के 100 भाई थे, लेकिन उनके अलावा उसका एक और भाई था, जिसके बारे में लोगों शायद ही पता हो. उसका नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है, उसने कुरुक्षेत्र के युद्ध में पांडवों का साथ दिया था. आइए जानते हैं कौरवों के 101वें भाई के बारे में.

कौन था कौरवों का 101वां भाई
धृतराष्ट्र और गांधारी से 100 पुत्र थे, लेकिन गांधारी की दासी सुगाधा और धृतराष्ट्र से भी एक पुत्र हुआ था, जो दुर्योधन का सौतेला भाई था. उसका नाम युयुत्सु था. युयुत्सु का लालन पालन और शिक्षा दुर्योधन के सभी भाइयों के समान ही हुआ था. लेकिन दुर्योधन ने युयुत्सु को अपना भाई नहीं माना और न ही उनका सम्मान किया. इस वजह से वे कौरवों से ज्यादा पांडवों के करीब थे.

कुरुक्षेत्र युद्ध में युयुत्सु ने क्यों नहीं दिया कौरवों का साथ?
पांडवों और कौरवों में जब कुरुक्षेत्र के युद्ध की घोषणा हुई तो युयुत्सु ने उसे रोकने का भरसक प्रयास किया लेकिन नी​यति को कोई डाल नहीं सकता. फिर वे कौरवों की ओर थे. लेकिन जब युद्ध का पहला दिन आया तो युधिष्ठिर ने कहा कि यह धर्म युद्ध है और सभी को पता है कि धर्म किस पक्ष की ओर है. जो लोग कौरवों की ओर से हमारे पक्ष में या हमारी ओर से कौरवों के पक्ष में जाना चाहते हैं, वे चले जाएं. उनका पूरा सम्मान है.

यह सुनकर युयुत्सु ने धर्म का पक्ष लेने का निर्णय लिया. वे कौरवों की सेना से निकलकर पांडवों की सेना में आ गए. उनके इस व्यवाहर पर दुर्योधन काफी क्रोधित हुआ.

युयुत्सु को मिला था विशेष काम
युयुत्सु काफी बुद्धिमान और प्रबंधन क्षमता में निपुण ​थे. इस वजह से पांडवों ने युयुत्सु को सीधे युद्ध के मैदान में न उतार करके सेना के लिए जरूरी प्रबंधन का काम सौंपा था. वे पांडवों की सेना के लिए खाना, पानी, हथियार आदि की व्यवस्था करते थे.

युयुत्सु ने धृतराष्ट्र को दी मुखाग्नि
महाभारत के युद्ध में दुर्योधन समेत सभी कौरव भाई मारे गए थे. कथा के अनुसार, धृतराष्ट्र की जब मृत्यु हुई तो युयुत्सु ने ही मुखाग्नि दी थी.

युधिष्ठिर ने युयुत्सु को बनाया था महामंत्री
युद्ध के समापन के बाद युधिष्ठिर को राजा बनाया गया. तब उन्होंने युयुत्सु को महामंत्री के पद पर बैठाया. काफी समय तक शासन करने के बाद पांडवों ने परीक्षित को राजपाट सौंप दिया और युयुत्सु को उनका संरक्षक बना दिया.

युयुत्सु ने किया अधर्म का त्याग
युयुत्सु ने अधर्म का साथ छोड़कर धर्म का मार्ग चुना था. इसके लिए उन्होंने अपने सौतेले भाइयों का त्याग कर दिया था. 18 दिनों तक चले कुरुक्षेत्र युद्ध के समापन के बाद कुल 11 लोग जीवित बचे थे, जिसमें युयुत्सु भी शामिल थे.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारियों पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)


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