
Margashirsha Maas 2024: मार्गशीर्ष माह की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि पर भगवान विष्णु ने अपने वराह स्वरूप का देह त्याग किया. जब हिरण्याक्ष राक्षस से एक बहुत बड़े और भीषण युद्ध के बाद प्रभू ने उसका वध कर दिया और उसके बाद समुद्र से निकाल कर प्रथ्वी को पुनः स्थापित किया. उसके बाद अपने खुर की सहायता से ज़मीन पर जल को स्तंभित कर दिया.उस आदिगंगा किनारे शूकर क्षेत्र में एकादशी तिथि पर व्रत किया और जल ग्रहण करके द्वादशी तिथि पर अपने व्रत का पारण किया तत्पश्चात द्वादशी तिथि पर ही अपने शरीर का उसी जल में त्याग किया एवं प्रभु साकेत लोक चले गए.
देह त्याग से पहले हुआ वराह प्रथ्वी का संवाद: वराह पुराण के अनुसार भगवान वराह ने पृथ्वी को हिरण्याक्ष के कब्जे से मुक्त कराकर शूकर क्षेत्र मे स्थापित किया, तब पृथ्वी ने उनसे संवाद किया था कि अब मैं यह जानना चाहती हूं कि ‘कुब्जाम्रक’ क्षेत्र में सबसे श्रेष्ठ एवं पवित्र आचरणीय व्रत और भक्तों को सुख देने वाला इसके अतिरिक्त अन्य तीर्थ कौन सा है? तब श्रीवराह देव ने कहा था, मेरे सभी क्षेत्र परम शुद्ध हैं, फिर भी ‘कोकामुख’, ‘कुब्जाम्रक’ तथा ‘सौकरव’ स्थान (शूकर क्षेत्र) उत्तरोत्तर उत्तम माने जाते हैं. इनमें संपूर्ण प्राणियों को संसार से मुक्त करने के लिए अपार शक्ति है. भागीरथी गंगा के समीप यह वही स्थान है, जहां मैंने तुम्हारा रसातल से उद्धार कर स्थापित किया है. सोरों जी शूकर क्षेत्र में जल, थल, अंतरिक्ष तीनों में मुक्ति है. यहां पृथ्वी का सबसे प्राचीनतम सतयुग कालीन ‘गृद्धवट’ बटुकनाथ मंदिर में है.
इस तिथि पर भगवान विष्णु की पूजा करने से मिलता है कभी न खत्म होने वाला पुण्य : मार्गशीर्ष माह शुक्लपक्ष की द्वादशी तिथि पर भगवान विष्णु की विशेष पूजा करने की परंपरा ग्रंथों में बताई गई है. इस दिन भगवान विष्णु और उनके वराह अवतार की पूजा करने से कभी न खत्म होने वाला पुण्य मिलता है. इसलिए इसे वराह द्वादशी भी कहते हैं.
FIRST PUBLISHED : December 11, 2024, 11:22 IST
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