Premanand Maharaj: प्रेमानंद जी महाराज एक प्रतिष्ठित संत हैं. बहुत से लोग उनके पास जीवन की परेशानियों का समाधान जानने आते हैं. महाराज जी सिखाते हैं कि कैसे आध्यात्मिकता और भगवान के नाम का सहारा लेकर हम दुखों से उबर सकते हैं और जीवन में शांति पा सकते हैं. उनकी शिक्षाएं लोगों को मजबूती देती हैं और उन्हें जीवन की मुश्किलों से लड़ने का हौसला देती हैं. हाल ही में प्रेमानंद जी महाराज से एक व्यक्ति ने पूछा कि जब कोई अपना ही हमें धोखा दे, अपमान करे या विश्वासघात करे, तो बहुत दुखद होता है, ऐसे में क्या करें?
महाराज जी ने कहा- “अगर आपने कोई बुरा कर्म नहीं किया है, तो कोई भी व्यक्ति आपके साथ बुरा नहीं कर सकता.” जो कुछ हमारे साथ हो रहा है, वह हमारे ही पुराने कर्मों का फल है. इसलिए दूसरों को दोष देने की बजाय, हमें अपने कर्मों को सुधारने पर ध्यान देना चाहिए. “कौन किसी को सुख-दुख देता है? जो जैसा करता है वैसा ही भोगता है.”
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पुराने जन्मों की बात क्यों नहीं याद रहती?
महाराज जी समझाते हैं कि अगर हमें इस जन्म की शुरुआत, यानी मां के गर्भ में बिताए 9 महीनों की बात भी याद नहीं है, तो पिछले जन्मों के कर्म कैसे याद होंगे? हम सबने मां के गर्भ में बहुत कष्ट सहे, लेकिन कुछ याद नहीं. यही कारण है कि हमें अपने कर्मों पर विश्वास रखना पड़ता है- “बिना कर्म के कोई हमें सुख-दुख नहीं दे सकता.”
अगर कोई अपना ही धोखा दे?
तो याद रखें, हमने भी कभी न कभी किसी के साथ ऐसा किया होगा. आज वही कर्म लौटकर आया है. अब अगर हम उस व्यक्ति की निंदा करते हैं, बदला लेने की सोचते हैं, या उसे नुकसान पहुंचाने की योजना बनाते हैं, तो हम नया बुरा कर्म कर रहे होते हैं- जिसे आगे चलकर हमें ही भुगतना पड़ेगा.
धोखा देने वाला सुखी क्यों दिखता है?
महाराज जी कहते हैं- जैसे कोई बड़ा अपराध करता है तो सजा देने में सरकार को भी समय लगता है. वैसे ही परमात्मा भी सबका हिसाब अपने समय पर करता है. दिखाई दे सकता है कि वो सुखी है, लेकिन उसके कर्मों का फल निश्चित है.
प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए?
जो भी हमारे साथ बुरा करे, हम भगवान से यही प्रार्थना करें- “प्रभु, उसकी बुद्धि शुद्ध कर दो. उसका कल्याण करो.” जब हम ऐसा भाव रखते हैं, तो चाहे उसका भला हो या न हो, हमारा भला निश्चित हो जाता है. यही भक्त का मार्ग है.
भगवान के हर रूप में विश्वास रखें
महाराज जी कहते हैं- “जो हमारे साथ जैसा व्यवहार कर रहा है, वही परमात्मा है.” जो हमें दुख देता है, वो भी किसी कारण से आया है- वह हमारे कर्मों का परिणाम है. इसीलिए हमें किसी से न तो नफरत करनी है, न बदला लेना है.
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प्रह्लाद जी के पिता हिरण्यकश्यप ने उन पर अत्याचार किए, लेकिन जब भगवान नरसिंह प्रकट हुए और हिरण्यकश्यप को मारा, तब भी प्रह्लाद जी को दुख हुआ. उन्होंने भगवान से प्रार्थना की- “प्रभु, मेरे पिता का उद्धार कर दीजिए. उन्होंने जैसा भी किया, थे तो मेरे पिता.” ऐसा ही भाव हमें भी रखना चाहिए जो भी हमारे साथ बुरा करे, हम उसकी भलाई की ही कामना करें.
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