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Riteshwar Maharaj: धुंधकारी की तरह करेंगे कर्म, तो गया में 100 बार भी श्राद्ध से नहीं मिलेगी मुक्ति, हजारों वर्ष तक बने रहेंगे भूत-प्रेत!

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Riteshwar Maharaj: श्री आनंद धाम के सद्गुरु रितेश्वर जी महाराज कहते हैं कि मरने के बाद मुक्ति होगी या नहीं होगी, यह मैं नहीं जानता क्योंकि श्रीमद् भागवत की कथा में बताया गया ​है कि धुंधकारी जब मरा, तो धुंधकारी …और पढ़ें

धुंधकारी की तरह करेंगे कर्म, तो गया में 100 बार श्राद्ध से नहीं मिलेगी मुक्ति

श्री आनंद धाम के सद्गुरु रितेश्वर जी महाराज.

हाइलाइट्स

  • कर्मों के आधार पर ही मुक्ति का मार्ग निकलता है.
  • धुंधकारी के 100 श्राद्ध के बाद भी नहीं मिली मुक्ति.
  • श्रीमद्भागवत कथा से ही धुंधकारी को मिली मुक्ति.

इस साल फाल्गुन अमावस्या 27 फरवरी गुरुवार को है. अमावस्या के दिन पितरों के आत्म शांति के लिए पिंडदान, श्राद्ध आदि करते हैं. अपने पूर्वजों को भूत, प्रेत, पिशाच योनि से मुक्ति दिलाने के लिए लोग ​गया जी में जाकर पिंडदान, श्राद्ध आदि करते हैं. पितृ दोष से मुक्ति के लिए भी अमावस्या पर पिंडदान, श्राद्ध, पंचबलि कर्म आदि किया जाता है. लेकिन आपको बता दें कि व्यक्ति के कर्मों के आधार पर ही मुक्ति का मार्ग निकलता है. यदि आपके कर्म धुंधकारी जैसे होंगे, तो आपका गया में 100 बार भी पिंडदान कर दिया जाएगा तो भी मुक्ति नहीं मिलेगी. हजारों वर्षों तक आपको भूत, प्रेत आदि योनि में भटकना पड़ सकता है. इसके बारे में बता रहे हैं श्री आनंद धाम के सद्गुरु रितेश्वर जी महाराज.

गया में 100 बार किया श्राद्ध, फिर ​भी नहीं मिली मुक्ति
सद्गुरु रितेश्वर जी महाराज कहते हैं कि मरने के बाद मुक्ति होगी या नहीं होगी, यह मैं नहीं जानता क्योंकि श्रीमद् भागवत की कथा में बताया गया ​है कि धुंधकारी जब मरा, तो धुंधकारी का भाई गोकर्ण ने गया में जाकर 100 बार उसका श्राद्ध किया, फिर ​भी उसको मुक्ति नहीं मिली. वह प्रेत बना रहा. अगर गया में श्राद्ध कर देने से किसी प्रेत की मुक्ति होती है तो श्रीमद् भागवत क्यों झूठ बोल रही है?

प्रश्न है तुमसे कि श्रीमद् भागवत में 100 बार अपने भाई के मुक्ति के लिए गोकर्ण ने प्रयत्न किया, लेकिन उसके बाद भी उसका भाई प्रेत बना रहा. ऐसा क्यों? उसे तो मुक्ति मिल जानी थी. लेकिन वह मुक्त नहीं हुआ क्योंकि वह जीते जी ही प्रेत था.

धुंधकारी जीते जी कैसे था प्रेत?
रितेश्वर महाराज बताते हैं ​कि धुंधकारी जब जीवित था, तो उसके कर्म ही प्रेतों वाले थे. वह वासनाओं में डूबा हुआ, कामनाओं में डूबा हुआ, बाप को लात मारने वाला और मां को आत्महत्या पर मजबूर कर देने वाला था. पंच तन मात्राएं शब्द, रूप, रस, गंध इत्यादि में वेश्याओं की भांति पड़े रहने वाला था. इस वजह से कोई अनुष्ठान और कर्मकांड उसको मुक्ति नहीं दिला सका.

कौन था धुंधकारी?
आत्मदेव नामक ब्राह्मण को कोई संतान नहीं थी, तो उसे एक साधु से संतान प्राप्ति के लिए एक फल दिया. लेकिन उसकी पत्नी से फल स्वयं न खाकर गाय को खिलाया और उससे गोकर्ण नामक बालक का जन्म हुआ. वहीं एक बालक धुंधकारी हुआ. आत्मदेव की पत्नी की बहन ने धुंधकारी को दिया था. धुंधकारी चोरी, दूसरों को कष्ट पहुंचाने वाला था. उसने पिता आत्मदेव की सारी संपत्ति बर्बाद कर दी. तो वह घर छोड़कर चले गए.

धुंधकारी ने धन के लिए एक दिन अपनी मां को मारा. यह रोज का सिलसिला बन गया, इससे तंग आकर उसकी मां ने कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली. जब धुंधकारी की मृत्यु हुई तो कर्मों के आधार पर उसे प्रेत योनि मिली. इससे मुक्ति के लिए गोकर्ण ने गया में उसके लिए श्राद्ध किया. फिर भी उसे मुक्ति नहीं मिली. वह सपने में आकर गोकर्ण के सामने रोता और कहता कि कुकर्मों के कारण ही अपने ब्रह्मणत्व को खत्म कर दिया.

फिर धुंधकारी को कैसे मिली मुक्ति
गोकर्ण ने सूर्य देव को प्रसन्न करके भाई धुंधकारी की मुक्ति का उपाय पूछा. तब उन्होंने कहा कि धुंधकारी के कर्म ही ऐसे थे, जिसकी वजह से 1000 श्राद्ध भी करोगे तो मुक्ति नहीं मिलेगी. श्रीमद्भागवत से ही धुंधकारी को मुक्ति मिल सकती है. गोकर्ण ने धुंधकारी की मुक्ति के लिए श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया.

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धुंधकारी की तरह करेंगे कर्म, तो गया में 100 बार श्राद्ध से नहीं मिलेगी मुक्ति


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