Sadhvi Prem Baisa Samadhi : जोधपुर की कथावाचक साध्वी प्रेम बाईसा की संदिग्ध मौत ने न सिर्फ कई सवाल खड़े किए, बल्कि एक पुरानी सनातन परंपरा को लेकर भी लोगों की जिज्ञासा बढ़ा दी. बालोतरा स्थित उनके पैतृक गांव में जब बड़ी संख्या में साधु-संतों की मौजूदगी में उन्हें भू-समाधि दी गई, तो आम लोगों के मन में स्वाभाविक सवाल उठा जब हिंदू समाज में दाह संस्कार को अंतिम संस्कार का प्रमुख तरीका माना जाता है, तो संन्यासियों के साथ यह परंपरा अलग क्यों है? आखिर उन्हें जलाया नहीं जाता, बल्कि धरती में समाधि क्यों दी जाती है? यह सवाल सिर्फ एक व्यक्ति या घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि संन्यास परंपरा, मोक्ष की अवधारणा और जीवन-मरण के सनातन दृष्टिकोण से जुड़ा हुआ है. साध्वी प्रेम बाईसा की समाधि ने इसी विषय को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है.
संन्यास परंपरा और समाधि का अर्थ
सनातन धर्म में “समाधि” सिर्फ एक अंतिम संस्कार नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक स्थिति मानी जाती है. माना जाता है कि संन्यासी सांसारिक जीवन का त्याग कर पहले ही मृत्यु को स्वीकार कर चुका होता है. उसका जीवन ब्रह्म, मोक्ष और निर्वाण की साधना में बीतता है. यही कारण है कि जब कोई संन्यासी देह त्याग करता है, तो उसे “मृत” नहीं बल्कि ब्रह्मलीन या कैलाशवासी कहा जाता है. यह शब्द अपने आप में दर्शाते हैं कि उसे एक ऊँची आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त हुई मानी जाती है.
किसे दी जाती है समाधि?
एक वेबसाइट को दी जानकारी में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष स्वामी रविंद्रपुरी जी महाराज के अनुसार हर साधु को समाधि नहीं दी जाती. समाधि का अधिकार उन्हीं संन्यासियों को होता है, जिन्होंने विधिवत कुंभ या अन्य मान्य परंपराओं के अनुसार संन्यास दीक्षा ली हो.
संन्यास से पहले की प्रक्रिया
संन्यास दीक्षा से पहले व्यक्ति को सफेद वस्त्र पहनाए जाते हैं, जनेऊ और शिखा के साथ उसे ब्रह्मचारी स्वरूप में रखा जाता है. इसके बाद उसका प्रतीकात्मक पिंडदान कराया जाता है. यह माना जाता है कि वह अपने पारिवारिक और सामाजिक बंधनों से मुक्त हो चुका है. इसी कारण जब वह देह त्याग करता है, तो उसका दाह संस्कार नहीं किया जाता. वैष्णव परंपरा से जुड़े बैरागी साधुओं को आमतौर पर समाधि नहीं दी जाती, यह परंपरा शैव और दशनामी संन्यासियों में अधिक प्रचलित है.
समाधि की पूरी प्रक्रिया कैसे होती है?
आम व्यक्ति के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया जहां 13 दिनों में पूरी होती है, वहीं संन्यासियों की समाधि प्रक्रिया 16 दिनों तक चलती है.
समाधि से पहले के अनुष्ठान
संन्यासी के देहावसान के बाद सभी संत-महात्मा एकत्र होते हैं. शंखनाद किया जाता है, शरीर पर चंदन, भस्म और गंगाजल लगाया जाता है. शिष्य और अनुयायी उन्हें माला और शॉल अर्पित करते हैं.
संन्यासी के पद और प्रतिष्ठा के अनुसार समाधि दी जाती है. बड़े और प्रतिष्ठित संन्यासियों को विशेष बक्से या आसन में बैठाकर भूमि में समाधिस्थ किया जाता है.

षोडशी भंडारा और आगे की परंपराएं
समाधि के बाद गीता पाठ होता है और 16वें दिन षोडशी भंडारे का आयोजन किया जाता है. इसमें 16 विधिवत दीक्षित संन्यासियों को आमंत्रित किया जाता है. उन्हें एक झोले में 16 आवश्यक वस्तुएं दी जाती हैं, जो संन्यास जीवन के प्रतीक मानी जाती हैं.
इसके बाद जिस तरह गृहस्थ जीवन में बरसी की परंपरा होती है, उसी तरह संन्यासी की वार्षिक स्मृति में भंडारा और पूजा-पाठ किया जाता है.

आज के समय में क्यों जरूरी है यह समझ?
साध्वी प्रेम बाईसा की समाधि ने यह स्पष्ट कर दिया कि संन्यास परंपरा सिर्फ धार्मिक रीति नहीं, बल्कि जीवन के प्रति एक अलग दृष्टिकोण है. यह परंपरा बताती है कि जिसने जीवन रहते संसार का त्याग कर दिया, उसके लिए मृत्यु भी एक उत्सव या यात्रा का अगला पड़ाव है.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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