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आपने अक्सर देखा होगा कि कई भारतीय घरों में सास-ससुर के अंतिम समय में दामाद को पास नहीं बैठने दिया जाता. हालांकि यह धारणा किसी धार्मिक ग्रंथ या प्रमाणित परंपरा से नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोककथाओं और अंधविश्वासों से जन्मी है, जिन पर लोग आज भी चर्चा करते हैं. आइए जानते हैं ससुर के आखिरी समय में उसके दामाद को पास क्यों नहीं बैठने दिया जाता…
भारत देश अपनी परंपराओं और विविधताओं से भरा हुआ है. यहां हर राज्य, जिले की एक अनूठी संस्कृति, भाषाएं, त्यौहार और रीति-रिवाज हैं, जो इसे सांस्कृतिक रूप से बेहद समृद्ध बनाते हैं. यह विविधता भाषा, पहनावा, खान-पान और रीति रिवाज जैसे हर पहलू में देखा जा सकता है. इन्ही रीति रिवाज में से एक अक्सर आपने भारतीय घरों में एक मान्यता सुनी होगी कि किसी व्यक्ति के अंतिम समय में जमाई यानी दामाद को पास नहीं बैठना चाहिए. कई बुज़ुर्ग कहते हैं कि उस क्षण ससुर को यमदूत दिखाई देते हैं और जमाई का वहां होना अशुभ माना जाता है. इसलिए दामाद को सास-ससुर की शवयात्रा में भी शामिल नहीं किया जाता है. आइए जानते हैं जमाई अपने ससुर के अंतिम समय में पास क्यों नहीं बैठ सकता…
आत्मा की शांति के लिए किया जाता है ऐसा
हिंदू परंपराओं में दामाद (जमाई) को यमदूत का प्रतीक माना गया है. जमाई का अर्थ होता है यम को बुलाने वाला इसलिए दामाद को यमदूत के रूप में देखा जाता है. मान्यता कहती है कि ससुर के अंतिम समय में दामाद की उपस्थिति मृत्यु को शीघ्रता से बुला सकती है अर्थात अंतिम समय में जमाई के पास बैठने से यम दूत दिखाई देने लगते हैं. ससुराल पक्ष के लिए दामाद का सहयोग चाहे आर्थिक हो या शारीरिक वर्जित माना गया है. यह भी कहा जाता है कि बेटी के पिता को दामाद के घर का पानी तक नहीं पीना चाहिए. इसलिए अंतिम संस्कार या मृत्यु के समय दामाद को दूर रखा जाता है ताकि आत्मा को शांति मिले और परंपरा बनी रहे.
दामाद से नहीं लिया जाता कोई भी सहयोग
दामाद से पुत्रों के समान कर्तव्यों का पालन नहीं करवाया जा सकता है. इसी वजह से दामाद को ना तो अंतिम समय में पास बैठने दिया जाता और ना ही शव यात्रा में शामिल होने दिया. यहां तक कि अर्थी को हाथ तक भी नहीं लगा सकता है. साथ ही उनसे किसी भी प्रकार का कोई सहयोग भी नहीं लिया जाता. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दामाद को सास-ससुर के अंतिम दर्शन भी नहीं करने चाहिए क्योंकि दामाद यमराज का रूप होता है. हिंदू धर्म में दामाद द्वारा सास-ससुर का अंतिम संस्कार करना पूरी तरह से वर्जित बताया गया है.
इसलिए दामाद को रखा जाता है दूर
धार्मिक विद्वानों की मानें तो इस बात की जानकारी तब मिली, जब सति के आत्मदाह करने के बाद महादेव ने अपने ससुर दक्ष का शीश काटकर उद्धार किया था. साथ ही तब से यह भी नियम चला कि दामाद अपने ससुर के पैर नहीं छूएगा. इसलिए दामाद कभी भी ना तो सास-ससुर की शवयात्रा में शामिल होता है और ना उनके चरण स्पर्श करता है. हालांकि वैदिक, पुराणिक या किसी प्रमुख शास्त्र में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है, जो दामाद को मृत्यु-क्षण से दूर रहने के नियम के रूप में बताता हो. इसका मतलब साफ है कि यह मान्यता संस्कृति के लोक-भाग से आई है, ना कि किसी धार्मिक आदेश से. फिर भी देश के कई हिस्सों में लोग अब भी इसे सच मानकर चलते हैं.
लोककथा बातचीत का हिस्सा
आज के समय में युवा पीढ़ी ऐसे विश्वासों को सवालों और तर्क की नजर से देखती है. कई परिवार इन रीति-परंपराओं को सिर्फ सम्मान के तौर पर निभाते हैं, जबकि कई पूरी तरह छोड़ चुके हैं. लेकिन यह भी सच है कि भारतीय समाज में पीढ़ियों से चली आ रहीं कहानियां, लोककथाएं और मान्यताएं खुद एक सांस्कृतिक धरोहर बन जाती हैं चाहे वे तर्कसंगत हों या नहीं. यही वजह है कि जमाई और यम वाली यह लोककथा आज भी हमारे आसपास बातचीत का हिस्सा बन जाती है.
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मैं धार्मिक विषय, ग्रह-नक्षत्र, ज्योतिष उपाय पर 8 साल से भी अधिक समय से काम कर रहा हूं। वेद पुराण, वैदिक ज्योतिष, मेदनी ज्योतिष, राशिफल, टैरो और आर्थिक करियर राशिफल पर गहराई से अध्ययन किया है और अपने ज्ञान से प…और पढ़ें
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