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दादी-नानी घर से दरिद्रता भगाने के लिए करती थीं इस्तेमाल, छुआ-छूत के दौर में भी रहा पवित्र, अब सिर्फ त्योहार पर आता नजर

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सूप: “साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय, सार-सार को गहि रहे थोथा देह उड़ाय”. कबीर दास जी का ये दोहा गागर में सागर जैसा है. एक दोहे में कह दिया गया है कि जो आपके लिए अच्छी चीज हो उसे रख लीजिए, जो बेकार हो उसे उड़ा दीजिए. सूप भी ऐसा ही करता है. हमारी पीढ़ी तो दोहे को समझ जाएगी. लेकिन महानगरों के फ्लैट में रह कर पब्लिक स्कूलों में पढ़ी पीढ़ी को इस दोहे का मतलब बिल्कुल ठीक-ठीक पकड़ पाने में कुछ वक्त लग सकता है. वजह ये है कि उन्होंने सूप देखा ही नहीं है. कुछेक ने देखा भी होगा तो उसे अनाज से उपयोग में न आने वाली चीजों को अलग करते नहीं ही देखा होगा.

गांवों कस्बे वाले तो दावा कर सकते हैं कि उनके घरों में सूप है. वहां सूप को घर निकाला न मिला हो लेकिन किसी कायदे की जगह तो नहीं ही होगा, जहां 21वीं सदी शुरु होने तक रहता था. भारतीय रसोई के सबसे सम्मानित वस्तुओं में सूप भी हुआ करता था. आगे से खुला लेकिन तीन तरफ कोरों से घिरा अपने खास आकार वाला सूप दिन में एक दो बार गृहलक्ष्मी के हाथों का स्नेहिल स्पर्श हासिल ही कर लेता था.

मिल से आए अनाज को सूप की जरुरत नहीं
पैकेट बंद चावल के चलन के पहले जब खेतों से सीधे घरों में अनाज आता था, तो ये ही उसकी फाइलन सफाई करने वाला उपकरण था. जिसे चलनी भी नहीं साफ कर सकती थी, उस चावल को सूप से फटक कर रसोई बनाने वाली माताएं और बहुएं उसमें से गर्द वगैरह निकाल देती थी. बहुत से घरों में दोपहर के वक्त गृहणियां गेहूं और चावल-दाल को साफ करते हुए सूप के साथ ही गुजारती थीं.

दौर बदला, तो मिलों से साफ किया हुआ अनाज घरों में दाखिला पा चुका था. जिन घरों में अपने खेत के अनाज इस्तेमाल में लाया भी जाता है, वो भी मिलों से अनाज को पूरी तरह साफ कराके लाते हैं. मशीनें अनाज को पूरी तरह साफ कर देती हैं. लिहाजा सूप बेचारा हो गया, शहरों और महानगरों के फ्लैट में न इतनी जगह है और न ही इतना वक्त कि सूप से फटक कर अनाज प्रयोग में लाया जाए. लिहाजा किसी तरह की रिवायती इस्तेमाल के लिए सूप खोजना हो तो लंबी पूछताछ लोगों से करनी होगी. तब जा कर सूप बिकने वाली जगह का पता मिल पाएगा.

सूप का आखिर काम-दरिद्दर खदेडना
बहुत से हिंदी राज्यों में सूप परंपरा से भी जुड़ा है. दीपावली के अगले दिन अलसुबह दरिद्दर (दरिद्र) खदेड़ने (भगाने) के काम आता है. दरिद्दर भगाने का काम करने से साथ ही सूप का जीवनकाल भी खत्म हो जाता है. दिन निकलने से पहले ही या तो उसे आग को समर्पित कर दिया जाता है या कहीं और विसर्जित कर दिया जाता है. अब घर में नया सूप आता है.

सुपली-सूप का मिनिएचर
सूप के ही बाल स्वरूप सुपली का प्रयोग बिहार और आस पास के इलाके में छठ के दौरान होता है. ये बांस की पतली और पट्टियों से बनती है. इसमें तमाम फल और मीठा रख कर महिलाएं सूर्यदेव को अर्घ्य देती हैं. हो सकता है कि बड़े आकार वाले सूप को ले जाने में होने वाली असुविधा से बचने के लिए इसका प्रयोग किया जाता हो. महिलाएं अर्घ्य दे रही हैं, तो रसोई की सारी वस्तुए अपने आराध्य को अर्पित करें इस कारण सुपली का इस्तेमाल शुरु किया गया होगा. हालांकि अब पीतल की सुपलियां भी प्रयोग में आ रही है.

कौन बनाता है सूप ?

गांवों में सूप खरीदना नहीं होता था. एक जाति विशेष के लोग इसे मूंज (सड़कों के किनारे उगने वाली लंबी घास जिससे छप्पर बनाया जाता है) में निकलने वाली पतली डंठलों को मोम मिली बारीक रस्सियों से बुनकर बनाते हैं. पहले के दौर में गांवों में वे अपने हिस्से के गृहस्थों के घर खुद ही पहुंचा दिया करते. बदले में उन्हें अनाज वगैरह मिल जाता. बाद में बाजार से खरीद कर आने लगा. लेकिन बहुत से जतन करने लोग टूटने से बचाने के लिए सूप पर तारकोल का लेप लगा कर उसे जमा देते थे. इससे सूप मजबूत हो जाता था.

छुआ-छूत के दौर में भी पवित्र रहा
दलित और कभी अछूत कही जाने वाली जातियों के मजबूत हाथों से सीकों का बना सूप बेहद पवित्र माना जाता था. इसे जहां -तहां रखने की मनाही रही है. काम के बाद नीचे जमीन पर इसे रखने वर्जित रहा है. आखिरकार खाने को साफ करना ही इसका काम है. लिहाजा गंदा कैसे किया जाय.

खलिहान में इस्तेमाल
सूप का एक और इस्तेमाल पहले अनाज को ओसाने के लिए किया जाता था. अनाज ओसाने का मतलब ये होता है कि गेंहू की बालियों से गेंहू निकालने के बाद सूप में रख कर उसे ऊपर से गिराया जाता था. बालियों से निकली भूसी और डंठल हवा के असर से दूसरी ओर उड़ जाते. यही प्रक्रिया धान के साथ भी की जाती. लेकिन थ्रेशर जैसे उपकरण आने के बाद सूप का ये भी प्रयोग बंद ही हो गया.


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https://hindi.news18.com/news/lifestyle/culture-traditional-kitchen-accessories-indian-tools-photo-of-soup-history-local18-8861898.html

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