ओखल: खेत से पैदा अनाज को पकाने योग्य बनाने में ऊखल कभी बहुत जरूरी लेकिन सरल उपकरण हुआ करती थी. आज कुछ रिवायती घरों में भले ही यह मिल जाए, लेकिन इससे कोई कुटाई जैसा काम शायद ही करता हो. नई पौध के ज्यादातर लोगों ने इसे तस्वीरों या किसी पुरानी फिल्म में ही देखा होगा. ऊखल का संबंध श्रीकृष्ण की बाल लीला से भी बताया जाता है.
ऊखल या ओखल धरती पर अनाज उगाए जाने के कुछ ही काल में बन गई होगी. कहीं-कहीं ओखली भी कहा जाता है. इसे भले ही इसका डमरू वाला इसका मॉडल बहुत बाद में आया हो, लेकिन अपने आदिम रूप में यह पाषाण काल में ही आ गई होगी. अनाज को कूट कर उसका छिलका अलग कर देने की युक्ति मनुष्यों को बड़ी आसानी से सूझ गई होगी. क्योंकि निश्चित तौर पर पूर्वज पत्थरों का खूब इस्तेमाल करते थे. कूटते समय जब अनाज उधर-उधर छिटक जाता रहा होगा तो पत्थरों की रगड़ से ही उस समय के लोगों ने एक पत्थर में बीच में हल्का गहरा बना कर उसी में कूटना शुरू कर दिया होगा.
वक्त बदलने के साथ इस ऊखल का रूप बदलता गया. डमरू जैसा रूप मिला. इसमें नीचे का हिस्सा बेस जैसा होता है और ऊपरी हिस्से में किसी बड़े शंक्वाकार कटोरे जैसी गहराई. इसी में अनाज डाल कर लकड़ी के गोल और वजनदार मूसल से अनाज कूटा जाता रहा. अस्सी के दशक तक तो गांवों और कस्बों के तकरीबन हर घर में होती ही थी. अनाज कूटने का काम ज्यादातर महिलाओं के जिम्मे ही रहता था. अभ्यस्त हाथों से अनाज कूटने की लय और हर प्रहार पर चूड़ियों की खनक बहुत से रसिकों-कवियों के लिए कविता और लिखने का मसला भी दे देती.
सत्तर के दशक तक तकरीबन सभी गांवों में महिलाएं खुद ही सुबह उठ कर इसी धक-धक और झन झन के रिदम में अनाज कूट कर उसे पकाती थीं. गांवों के रईशनुमा लोगों के घरों में ये जिम्मा परिवार की औरतों की जगह नौकरी पर लगी महिलाओं को मिल जाता. सोने जैसे धान के दाने को चावल में बदलने वाली यही ऊखल गरीबों को कोदो, सांवा, ज्वार, बाजरा और मक्के को भात के तौर पर पकाने को तैयार करती रही. यही वो मोटे अनाज हैं, जो आज मिलेट के नाम से महानगरों में बहुत महंगे बिक रहे हैं.
श्रीकृष्ण के बाल सखा कोदो लेकर ही त्रिभुवन नाथ से मिलने द्वारका पहुंच गए थे. उसे बड़े ही भाव से केशव के खाने का जिक्र नरोत्तम दास ने किया है. खैर, ऊखल से श्रीकृष्ण की बाल लीला का भी बहुत गहरा नाता है. माता यशोदा ने श्रीकृष्ण के उत्पात से ऊब कर उन्हें ऊखल से ही बांध दिया था. हालांकि लीलाधर ने उसे घसीट कर नारद के श्राप से पेड़ बन चुके दो यक्षों को मुक्ति दिलाई. श्रद्धालुओं और पुजारियों का दावा है कि वह जगह जहां बाल कृष्ण को बांधा था और जिस ऊखल से बांधा था, दोनों मथुरा स्टेशन के पास गोकुल वन में आज भी हैं.
ऊखल ज्यादातर जगहों पर काठ से ही बनी होती थी. कुछ जमींदार नुमा व्यक्ति के घर में पत्थर वाली ऊखल होती थी. लेकिन मूसल तो हमेशा काठ का ही होता रहा. मूसल के अंत में लोहे का छल्ला भी होता था. उसका आकार भी ऐसा होता था कि बीच से उसे अच्छे से पकड़ा जा सके.
बदलते वक्त के साथ सब कुछ बिजली की मोटरों से चलने लगा. लिहाजा, ऊखल कुछ रश्मों के लिए पारंपरिक घरों के किसी कोने में रखी तो रहती हैं, लेकिन अपना मूल काम उनसे नहीं लिया जाता. कस्बों और शहरों के घरों में तो उनके लिए जगह बची ही नहीं. लिहाजा, जेन ज़ेड से अगर पूछा जाए कि क्या ऊखल देखा है तो जवाब या तो नहीं मिलेगा या कहेंगे फोटो देखी है.
FIRST PUBLISHED : November 26, 2024, 14:31 IST
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