
सनन्दन उपाध्याय/बलिया: पूर्वांचल के कुछ जिले में आज भी विवाह संस्कार के दौरान एक अनोखी परंपरा देखने को मिलती है. दरअसल यह परंपरा बेहद प्राचीन है. इसे धान मिलाने की रस्म कहते हैं. इस रस्म की कई सारी खासियत है.
धान न मिलाने की रस्म धान धान्य शब्द से बनी है. इसका मतलब ऐश्वर्य, धन और संपदा से भी होता है. यह बहुत प्राचीन परंपरा है जो अब सीमित रूप में बरकरार है. इसमें धान, हल्दी, गुड़ और दुर्वा भी मिलाया जाता है. खासतौर पर पूर्वांचल के कुछ जिलों में आज भी ये परंपरा कायम है. इसके बगैर इन जिलों में शादी विवाह संपन्न नहीं मानी जाती है.
धान मिलाने की रस्म क्या है?
आचार्य पंडित भूपेंद्र कुमार मिश्रा ने बताया कि विवाह में धान का प्रयोग किया जाता है. ये धान तिलक अथवा वर (दूल्हा) वर्ण के समय दूल्हा दुल्हन को मिलती है. इसके साथ हल्दी, गुड़ और दुर्वा (दूब घास) भी होता है. इसका उद्देश्य यह है कि जिस तरह धान ताप मिलने पर लावा की तरह खिल जाता है, उसी तरह आपका वैवाहिक जीवन भी कष्ट आने पर भी खिला-खिला रहे. हल्दी शुभ और गुड़ मिठास का प्रतीक होता है. दूर्वा जमीन यानी मिट्टी से जुड़ा होता है. दुर्वा से एक दूसरे की पकड़ मजबुत होती है. यानी दूर्वा वैवाहिक जीवन में एक दूसरे से जुड़ाव, संतान, खुशियों का विस्तार आदि का प्रतीक है.
अंत में लावा से भर जाता है पूरा मंडप
विवाह में धान का प्रयोग लावा के रूप में हवन में किया जाता है. इसे लाजा होम कहते हैं. मंत्र – ईमानलाजा नाऊपंतौ समृद्धि करणम तव… इसका इतना प्रयोग होता है कि विवाह का मंडप अंततः इस लावे से भर जाता है.
इसे भी पढ़ें – Unique Wedding: सात फेरों के बदले शादी में हो गया ये कारनामा….नये रस्म की हो गई शुरुआत
आजकल बहुत से लोग इस रस्म को नहीं जानते. लेकिन एक समय पर इस रस्म के बिना शादी अधूरी मानी जाती थी. आज भी कई जिले और परिवार हैं, जहां पर इस रस्म को निभाया जा रहा है.
FIRST PUBLISHED : December 18, 2024, 12:06 IST
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
https://hindi.news18.com/news/lifestyle/culture-unique-wedding-rituals-of-dhan-milane-ki-rasam-meaning-local18-8903249.html

















