Arjun Ke Shankh Ka Kya Naam Tha In Hindi : महाभारत के महान योद्धा अर्जुन के पास न सिर्फ़ दिव्य धनुष ‘गांडीव’ था, बल्कि एक बहुत ही शक्तिशाली और दिव्य शंख भी था. अर्जुन के इस शानदार शंख का नाम ‘देवदत्त’ था. यहां अर्जुन के शंख ‘देवदत्त’ के इतिहास, उसकी शक्ति और कुरुक्षेत्र युद्ध में उसकी भूमिका के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है…
‘देवदत्त’ शंख की उत्पत्ति और प्राप्ति-
अर्जुन को यह शंख उनके पिता और स्वर्ग के राजा इंद्र ने भेंट किया था. पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब अर्जुन दिव्य अस्त्रों की खोज में इंद्रलोक (स्वर्ग) गए थे, तब उन्होंने वहां कई वर्षों तक कठिन अभ्यास किया और असुरों का संहार किया. उनकी वीरता से प्रसन्न होकर देवराज इंद्र ने उन्हें यह दिव्य ‘देवदत्त’ शंख प्रदान किया. ‘देवदत्त’ का अर्थ होता है—”देवताओं द्वारा दिया गया”.
शंख की ध्वनि की शक्ति-
देवदत्त शंख कोई साधारण शंख नहीं था. इसकी ध्वनि इतनी भीषण और गूंजने वाली थी कि जब अर्जुन इसे बजाते थे, तो आकाश और पृथ्वी दोनों कांप उठते थे. इसकी ध्वनि से शत्रुओं के हृदय में भय व्याप्त हो जाता था और उनकी सेना का मनोबल टूट जाता था। महाभारत के भीष्म पर्व में उल्लेख है कि जब अर्जुन ने अपना शंख बजाया, तो उसकी गूंज ने कौरव सेना के वीरों को विचलित कर दिया था.
कुरुक्षेत्र के युद्ध में महत्व-
कुरुक्षेत्र के युद्ध के प्रारंभ में, जब भगवान श्रीकृष्ण ने अपना ‘पाञ्चजन्य’ शंख बजाया, उसके तुरंत बाद अर्जुन ने अपने ‘देवदत्त’ शंख का उद्घोष किया. श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के 15वें श्लोक में इसका स्पष्ट वर्णन मिलता है.
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजय: | पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदर: ||
इसका अर्थ है—”हृषीकेश (कृष्ण) ने पाञ्चजन्य बजाया और धनंजय (अर्जुन) ने देवदत्त बजाया…”. इन शंखों की सामूहिक ध्वनि ने अधर्म के विरुद्ध धर्म के युद्ध का शंखनाद किया था.
शंखों की सूची (अन्य पांडवों के शंख)
महाभारत के युद्ध में केवल अर्जुन ही नहीं, बल्कि सभी पांडवों के पास अपने विशिष्ट शंख थे-
श्रीकृष्ण: पाञ्चजन्य
अर्जुन: देवदत्त
भीम: पौण्ड्र (यह अत्यंत विशाल और भयानक ध्वनि वाला था)
युधिष्ठिर: अनंतविजय
नकुल: सुघोष
सहदेव: मणिपुष्पक
विजय का प्रतीक
अर्जुन का ‘देवदत्त’ शंख उनकी विजय का प्रतीक था. यह शंख केवल युद्ध की घोषणा के लिए ही नहीं, बल्कि युद्ध के दौरान महत्वपूर्ण क्षणों में सेना को संकेत देने और शत्रुओं को मानसिक रूप से पराजित करने के लिए भी उपयोग किया जाता था.
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