कोल्हापुर में हर त्योहार को पूरे जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है, चाहे वह पाडवा हो या शिमगा. कोल्हापुरवासियों के लिए श्री महालक्ष्मी (अंबाबाई) मंदिर त्योहारों के उत्सव का केंद्र बिंदु है. दिवाली भी इसका अपवाद नहीं है. नरक चतुर्दशी से अंबाबाई का कार्तिक स्नान शुरू होता है, जिसमें पहले लोग भोर में पंचगंगा नदी में स्नान करते थे, दीप जलाते थे और फिर मंदिर जाकर दर्शन करते थे. दिवाली के समय मंदिर के शिखर पर दीप जलाया जाता है.
सुबह के समय अंबाबाई के मंदिर में विशेष तैयारी
सूरज उगने से पहले भक्त मंदिर में एकत्र होते हैं. भक्तों द्वारा लाए गए सूत और घी से एक मोटी वात (काकड़ा) बनाई जाती है. इस काकड़े की पूजा गंध और फूल से होती है. रोषणनायक और कुछ युवा भक्त शिखर पर चढ़कर काकड़े को जलाते हैं. इस रस्म के पीछे की मान्यता को मंदिर के विशेषज्ञ प्रसन्न मालेकर ने समझाया है.
पंद्रह दिन का दीपदान और मंदिर की विशेष व्यवस्था
यह काकड़ा नरक चतुर्दशी से त्रिपुरारी पूर्णिमा तक जलाया जाता है. इन दिनों में मंदिर के दरवाजे कुछ विशेष समय पर खोले जाते हैं. नरक चतुर्दशी और त्रिपुरारी पूर्णिमा के दिन रात 2 बजे मंदिर खुलता है, जबकि बाकी दिनों में सुबह 3:30 बजे खोला जाता है. देवी की सुबह की आरती, जो आमतौर पर 9:30 बजे होती है, इन दिनों 6:00 बजे कर दी जाती है, जिससे 8:30 बजे की महापूजा पहले हो जाती है. इस दौरान देवी का दूध से स्नान होता है, हालांकि प्राचीन मूर्ति की सुरक्षा को देखते हुए 1996 से इसे बंद कर दिया गया है.
आरती में महिलाओं की विशेष भूमिका
सामान्य दिनों में पुरुष भक्त पितल के उंबर के बाहर और महिलाएं भीतर होती हैं. लेकिन इन पंद्रह दिनों में यह व्यवस्था उलटी होती है. पुराने समय में कोल्हापुर की स्थानीय महिलाएं पाच आरती का नियम मानती थीं. इस दौरान भक्तों की अधिक संख्या के कारण महिलाओं को अंदर रहने की व्यवस्था की जाती है.
दीपदान का महत्व और प्रथाओं में बदलाव
दीपदान का शास्त्रों में बहुत महत्व है. जमीन पर दीप जलाने के अलावा पानी में भी दीप छोड़ने की प्रथा है. सबसे ऊँचे स्थान, यानी मंदिर के शिखर पर दीप जलाया जाता है. इसी परंपरा के तहत राजा के पुराने महल के पास रहने वाले झंवर मारवाड़ी ने भी अपने घर का एक मंजिल कम कर दिया था ताकि मंदिर शिखर सबसे ऊँचा रहे.
लक्ष्मी का स्वागत और दिवाली का महत्व
शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायन के दौरान सूर्य, अमावस्या में चंद्र और मौसम के कारण शरीर की ऊर्जा कम हो जाती है. इस दौरान अलक्ष्मी (धूमावती) को विदा करने और लक्ष्मी का स्वागत करने के लिए अग्निक्रीड़ा (फटाके जलाना, दीप जलाना) की जाती है.
FIRST PUBLISHED : November 6, 2024, 16:09 IST
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