Last Updated:
हमने अपने जीवन में कई ऐसे लोगों को देखा है, जो कि सांसारिक सुख-सुविधाओं को छोड़कर वैराग्य अपना लेते हैं. उन्हें साधु-संतों की दुनिया अच्छी लगने लगती है या कुछ तो बचपन से ही मोहमाया त्यागकर सन्यास ले लेते हैं.
कुंडली में ऐसी है शनि की दृष्टि, स्थिति और योग, तो व्यक्ति मोह-माया छोड़कर बन सकता है साधु-संन्यासी
Sanyasi Yog In Kundali: शास्त्रों के अनुसार, माना जाता है कि हर व्यक्ति का भाग्य उसके जन्म के साथ ही तय हो जाता है. उसकी जिंदगी में वह किस राह पर जाएगा यह भी पहले से निर्धारित हो जाता है. ज्योतिषशास्त्र एक ऐसी विद्या है जिससे की हम इन सभी बातों का आंकलन कर सकते हैं, कि आगे चलकर व्यक्ति किस राह पर जाएगा. जी हां, ज्योतिष में कई योग ऐसे भी बताए गए हैं जो कि व्यक्ति को साधु-संत, सन्यासी, महापुरुष या योगी बनाती हैं.
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, कुंडली में कुछ ऐसे योग व ग्रहों की स्थितिया होती हैं जो कि व्यक्ति को सन्यासी बनाती है. व्यक्ति अपने सारे सारे ऐशो-आराम, सुख सुविधा, परिवार को छोड़कर अपने परिजनों से विरक्त होकर एकांतवासी बन जाता है. लेकिन आज हम जानेंगे कुंडली में स्थिति शनि की कुछ विशेष स्थितियों के बारे में जो कि इंसान को वैराग्य की ओर ले जाती है. आइए ज्योतिषाचार्य डॉ अरविंद पचौरी के अनुसार जानते हैं कि कुंडली के वह कौन से योग हैं जो कि व्यक्ति के मन में विरक्ति का भाव जागा कर उसे सन्यास की तरफ बढ़ाता है.
लग्न पर शनि की दृष्टि
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, व्यक्ति का लग्न उसके स्वभाव, कद-काठी व व्यवहार को दर्शाता है. ऐसे में कहा जाता है कि अगर किसी व्यक्ति का लग्न मजबूत है तो वह सांसारिक सीवन को सहजता से निभा लेता है. वहीं अगर लग्न कमजोर है और उसपर शनिदेव की दृष्टि पड़ जाती है तो ऐसे में व्यक्ति के मन में वैराग्य की भावना जाग उठती है और वह साधु-संन्यासी बनने की तरफ बढ़ चलता है.
कैसे जानें आपका लग्न मजबूत है या कमजोर?
कब होता है लग्न मजबूत-
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, जब कभी भी लग्न पर शुभ और कुंडली के मजबूत ग्रहों की दृष्टि पड़ती है, तो ऐसे में लग्न का स्वामी त्रिक भाव यानी (6,8,12) में नहीं है। लग्न का स्वामी केंद्र भाव (1,4,7,10) में शुभ स्थिति में है या फिर अपनी उच्च राशि में है. तब समझ लें कि आपका लग्न मजबूत है.
इस स्थिती में होता है लग्न कमजोर-
जब लग्न का स्वामी कुंडली के त्रिक भावों (6,8,12) में हो और लग्न के स्वामी पर शनि, राहु, केतु जैसे अशुभ ग्रहों की दृष्टि हो, ऐसी स्थिति में लग्न कमजोर हो जाता है.
यह भी पढ़ें- Mahakumbh Amrut Snan: शाही स्नान को क्यों किया गया अमृत स्नान? जूना अखाड़े के पीठाधीश्वर ने बताई वजह
चंद्र राशि के स्वामी पड़े शनि की दृष्टि
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, जब कुंडली में चंद्र राशि का स्वामी कमजोर स्थिति में हो और उसपर शनि की दृष्टि पड़ती है. तो इस स्थिति में व्यक्ति संसार के सभी आराम त्यागकर मोहमाया से दूर रहता है. ऐसे लोगों को आध्यात्म में रुचि रहती है और साधु-संन्यासी बन जाते हैं. बता दें कि चंद्रमा जिस राशि में कुंडली में विराजमान रहता है उसे चंद्र राशि कहा जाता है.
शनि की दृष्टि लग्न के स्वामी पर हो
अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में उसके लग्न यानी पहले भाव का स्वामी जहां भी हो और उसपर शनि की दृष्टि पड़ रही हो, तो ऐसे में व्यक्ति के अंदर वैराग्य की भावना उत्पन्न हो जाती है. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, इस तरह का योग व्यक्ति को एकांतवासी बनाता है, वह सांसारिक जीवन में घुल-मिल नहीं पाता और सन्यास उसे ज्यादा रास आता है.
यह भी पढ़ें- Naga Sadhu: पूरे दिन में सिर्फ इतना भोजन करते हैं नागा साधु, यहां जानें इनके अनसुने रहस्य
नवम भाव में शनि
ज्योतिष के अनुसार, कुंडली का नवम भाव धर्म का भाव कहलाता है. ऐसे में जब नवम भाव में शनि अकेला बैठ जाए या फिर उसपर किसी ग्रह की दृष्टि नहीं होती तो वह सन्यासी बनने की तरफ अग्रसर होता है. ऐसे लोग काफी धार्मिक प्रवृत्ति के होते हैं और संसार के प्रति विरक्ति का भाव ऐसे व्यक्ति में बचपन से ही देखा जा सकता है.
January 17, 2025, 13:21 IST
कुंडली में ऐसी है शनि की दृष्टि, स्थिति और योग, तो व्यक्ति बन सकता है साधु-संत







