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गंगा-यमुना नहीं, फिर भी यहां लगता है कुंभ! कैसे शुरू हुई दक्षिण भारत की यह अनोखी परंपरा?


Agency:Local18

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Kumbh Mela Mysore: मैसूर में 1989 से शुरू हुआ दक्षिण का कुंभ मेला अब आस्था का बड़ा केंद्र बन चुका है. कावेरी तट पर तिरुमकुडालु नरसीपुर में हर तीन साल में आयोजित होता है. इस बार 10-12 फरवरी को 13वां कुंभ मेला हु…और पढ़ें

गंगा-यमुना नहीं, फिर भी यहां लगता कुंभ!कैसे शुरू हुई दक्षिण भारत की यह परंपरा?

मैसूर: दक्षिण भारत का कुंभ मेला – आस्था का महासमुद्र

हाइलाइट्स

  • मैसूर में 1989 से शुरू हुआ दक्षिण का कुंभ मेला.
  • कावेरी तट पर तिरुमकुडालु नरसीपुर में हर तीन साल में होता है.
  • इस बार 10-12 फरवरी को 13वां कुंभ मेला हुआ.

मैसूर: प्रयागराज में इस समय कुंभ मेले में संगम किनारे लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं का हुजूम, गंगा में डुबकी लगा रहा है. हर 12 साल में आने वाला ये महाकुंभ सिर्फ एक मेला नहीं, बल्कि आस्था का महासमुद्र है. 13 जनवरी से शुरू होकर 26 फरवरी तक चलने वाले इस महायज्ञ में हर कोने-कोने से लोग उमड़ रहे हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि उत्तर का यह कुंभ अब दक्षिण में भी अपनी पहचान बना चुका है? जी हां, कुंभ केवल प्रयागराज तक सीमित नहीं है. दक्षिण भारत के मैसूर जिले में भी कुंभ मेला होता है.

कैसे हुई दक्षिण में कुंभ की शुरुआत
अब आप सोच रहे होंगे कि भला दक्षिण में कुंभ मेला कैसे आया? क्या गंगा-यमुना वहां बहने लगीं? नहीं जनाब, बात 1989 की है, जब अदिचुंचनगिरी मठ के पूज्य बालगंगाधरनाथ स्वामीजी प्रयागराज के त्रिवेणी संगम में स्नान कर लौट रहे थे. यात्रा के दौरान बेंगलुरु के कैलाशाश्रम के तिरुचि स्वामीजी और ओंकाराश्रम के शिवपुरी स्वामीजी से चर्चा हुई कि दक्षिण भारत के लोग कुंभ मेले के पुण्य लाभ से वंचित क्यों रहें? फिर क्या था, विचार मंथन शुरू हुआ.

कावेरी तट पर भी पुण्य-स्नान!
अब मुश्किल यह थी कि दक्षिण में ऐसा कौन-सा पवित्र स्थान हो, जो प्रयागराज के समकक्ष हो? तभी तिरुचि स्वामीजी ने याद दिलाया कि कावेरी नदी के किनारे भी कई पवित्र स्थल हैं, जो आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं. बालगंगाधरनाथ स्वामीजी ने इस सुझाव को हाथों-हाथ लिया और तिरुमकुडालु नरसीपुर को चुना गया, जहां कावेरी, कबिनी और हेमावती नदियों का संगम होता है.

चार संतों का संकल्प और पहला कुंभ
बालगंगाधरनाथ स्वामीजी ने मैसूर लौटकर सुत्तूर मठ के शिवरात्रि देशिकेंद्र स्वामीजी के साथ गहन चर्चा की और फिर तिरुमकुडालु नरसीपुर के संगम का दौरा किया. आखिरकार, तिरुचि स्वामीजी की सलाह और चारों संतों के संकल्प से दक्षिण भारत का पहला कुंभ मेला माघ पूर्णिमा के दिन आयोजित किया गया.

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आज दक्षिण का कुंभ भी बना आस्था का केंद्र
जो कुंभ मेला 1989 में छोटे स्तर पर शुरू हुआ था, वह आज दक्षिण भारत में आस्था का एक बड़ा केंद्र बन चुका है. कुंभ मेला हर तीन साल में एक बार आयोजित किया जाता है.हर बार श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती ही जा रही है और इस बार तो 13वां कुंभ मेला अपने पूरे रंग में सजा है. इस बार मेला 10 से 12 फरवरी तक आयोजित हुआ.

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