
Maha Kumbh 2025: धर्म और आस्था की नगरी प्रयागराज में इन दिनों महाकुंभ की तैयारियां जोरों पर हैं. 45 दिन तक चलने वाला यह मेला शुरू होने में लगभग 1 माह बचा है. ऐसे में मेला प्रसाशन की ओर से सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं. संगम नगरी प्रयागराज में लगने वाले इस मेले में देश-विदेश से लोग स्नान करने के लिए पहुंचते हैं. इस अद्वितीय धार्मिक उत्सव के दौरान प्रयागराज के प्रमुख घाटों के अलावा यहां स्थित कुछ मंदिरों के दर्शन करना एक यादगार अनुभव हो सकता है. इन्हीं में से एक है नागवासुकी मंदिर. इन मंदिर का इतिहास बहुत ही पुराना है. कहा जाता है कि इस मंदिर के दर्शन किए बिना संगम से लौटना अधूरी यात्रा के बराबर है. इसलिए यदि आप महाकुंभ जाएं तो नागवासुकी मंदिर के दर्शन कर खुद को कृतार्थ करें. आइए जानते हैं नागवासुकी मंदिर के बारे में कुछ खास-
…जब औरंगजेब का भाला भी नहीं आया काम
धर्म और आस्था की नगरी प्रयागराज के संगम तट से उत्तर दिशा की ओर दारागंज के उत्तरी कोने पर अति प्राचीन नागवासुकी मंदिर स्थित है. इस मंदिर में नागों के राजा वासुकी नाग विराजमान रहते हैं. मान्यता है कि प्रयागराज आने वाले हर श्रद्धालु और तीर्थयात्री की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है, जब तक की वह नागवासुकी का दर्शन न कर लें. कहा जाता है कि, जब मुगल बादशाह औरंगजेब भारत में मंदिरों को तोड़ रहा था, तो वह नागवासुकी मंदिर को खुद तोड़ने पहुंचा था. जैसे ही उसने मूर्ति पर भाला चलाया, तो अचानक दूध की धार निकली और चेहरे के ऊपर पड़ने से वो बेहोश हो गया था. अंत में उसे हताश और निराश होकर वापस लौटना पड़ा. तब से लेकर आज तक इस प्राचीन मंदिर की महिमा का गुणगान चारों दिशाओं में हो रहा है.
यहां नागों के राजा वासुकी ने किया था विश्राम
पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन में देवताओं और असुरों ने नागवासुकी को सुमेरु पर्वत में लपेटकर उनका प्रयोग रस्सी के तौर पर किया था. वहीं, समुद्र मंथन के बाद नागराज वासुकी पूरी तरह लहूलुहान हो गए थे और भगवान विष्णु के कहने पर उन्होंने प्रयागराज में इसी जगह आराम किया था. इसी वजह से इसे नागवासुकी मंदिर कहा जाता है.
भगवान विष्णु से नागवासुकी को प्राप्त हैं 3 वरदान
जानकार बताते हैं कि जब देवताओं एवं राक्षसों को समुद्र मंथन के लिए बड़ी रस्सी की जरूरत थी. तब नागों के राजा नागवासुकी रस्सी बने थे. इनको भगवान विष्णु से 3 वरदान प्राप्त हैं, जिनमें से पहला वरदान है कि संगम में स्नान करने के बाद बिना इनके दर्शन के स्नान पूरा नहीं होगा. वहीं, दूसरा वरदान है कि इनके दर्शन मात्र से ही कालसर्प दोष खत्म होता है. तीसरे वरदान में खुद नगर देवता बेदी माधव प्रत्येक वर्ष इनकी पूजा करने आते हैं. यही वजह है कि कुंभ और सावन में इस मंदिर में भारी उमड़ती है.
कब है महाकुंभ मेला 2025
महाकुंभ की शुरुआत पौष पूर्णिमा स्नान के साथ होती है, जोकि 13 जनवरी 2025 को है. वहीं, महाशिवरात्रि के दिन 26 फरवरी 2024 को अंतिम स्नान के साथ कुंभ पर्व का समापन होगा. इस तरह से महाकुंभ 45 दिन तक चलता है, जिसकी भव्यता देखते ही बनती है.
FIRST PUBLISHED : December 15, 2024, 08:59 IST






