श्रीनगर गढ़वाल: उत्तराखंड में मां के कई मंदिर स्थित हैं, लेकिन श्रीनगर गढ़वाल से लगभग 20 किलोमीटर दूर देवलगढ़ में मां राजराजेश्वरी का एक ऐसा मंदिर है जिसे जागृत शक्ति पीठ माना जाता है, जहां अखंड ज्योत जलती है. इस मंदिर का निर्माण 14वीं शताब्दी में राजा अजयपाल ने करवाया था, जब उन्होंने देवलगढ़ को गढ़वाल की राजधानी बनाया. यहां मां राजराजेश्वरी मंदिर में नहीं, बल्कि तीन मंजिला भवन की तीसरी मंजिल पर निवास करती हैं.
यंत्र प्रधान पूजा की विशेषता
सदियों से यहां यंत्र पूजा की परंपरा चली आ रही है, जिसमें कामाख्या यंत्र, महाकाली यंत्र, महालक्ष्मी यंत्र, बगलामुखी यंत्र और श्री यंत्र की विधिवत पूजा होती है. खास बात यह है कि यहां उत्तराखंड का एकमात्र उन्नत श्री यंत्र स्थापित है. राजराजेश्वरी गढ़वाल की कई जातियों की कुलदेवी भी मानी जाती हैं. राजराजेश्वरी मंदिर के पुजारी शक्ति उनियाल ने Bharat.one को बताया कि 52 गढ़ों में से देवलगढ़ ही एकमात्र जागृत गढ़ है. यहां यंत्र प्रधान पूजा होती है, जिसमें कामाख्या यंत्र, महाकाली यंत्र, महालक्ष्मी यंत्र, बगलामुखी यंत्र और श्री यंत्र सहित अन्य यंत्र भी मौजूद हैं.
तीन मंजिला भवन में निवास
इसलिए तीन मंजिला भवन में रहती हैं राजराजेश्वरी. पुजारी शक्ति उनियाल बताते हैं कि मां राजराजेश्वरी देवलगढ़ में तीन मंजिला भवन की तीसरी मंजिल पर निवास करती हैं. उन्होंने कहा कि भगवती मूल रूप से या तो अपने भवन में रहती हैं या फिर राज भवन में. मां राजराजेश्वरी उत्तराखंड से बाहर विभिन्न क्षेत्रों में प्रतीकात्मक रूप से गई हैं, और उत्तराखंड में लोगों ने उन्हें अपने घरों में प्रतीकात्मक रूप से स्थापित किया है. धनवान लोगों ने राजराजेश्वरी को तीन मंजिला भवन में स्थापित किया, जबकि सामान्य लोगों ने उन्हें अपने घरों में स्थापित किया.
गढ़वाल की कुलदेवी के रूप में राजराजेश्वरी
गढ़वाल की कई जातियों की कुलदेवी हैं राजराजेश्वरी. उन्होंने बताया कि राजराजेश्वरी तिरुपुर सुंदरी हैं, और इसीलिए उन्हें तीन मंजिला भवन में स्थापित किया जाता है. आज भी भगवती मंदिर में नहीं बल्कि उत्तराखंड के अनेक क्षेत्रों में लोगों के घरों में निवास करती हैं. गढ़वाल राजवंश की सभी जातियां, चाहे वे ब्राह्मण हों, ठाकुर हों, या अन्य, सभी की कुलदेवी राजराजेश्वरी हैं. वर्तमान में लोग अपने मूल से जुड़ना चाहते हैं, इसलिए भक्त देश-विदेश से मां राजराजेश्वरी के दर्शन करने के लिए आते हैं.
FIRST PUBLISHED : October 26, 2024, 21:33 IST






