भारत के राजनेता और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार की मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार हो रहा है. अब उनका परिवार अगले 13 दिनों तक गरुण पुराण का पाठ सुनेगा. भारत में हिंदू परिवारों में आखिर गरुण पुराण का पाठ क्यों जरूरी माना जाता है. इसका आत्मा की विदाई और 13 दिनों तक करने से क्या रिश्ता होता है. क्यों कहते हैं कि आत्मा भी इसका पाठ सुनती है.
भारत में हिंदू धर्म के लोगों के बीच मृत्यु के बाद गरुड़ पुराण का पाठ करना एक गहरी आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक परंपरा है. ये काम मृत्यु के बाद हिंदू परिवारों में सैकड़ों सालों से हो रहा है. ये केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई वजहें बताई जाती हैं. हिंदू मान्यता है कि मृतक सदस्य की आत्मा गरुण पुराण सुनने के बाद ही असल में घर से विदा होती है.
गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा के बारे में विस्तार से बताया जाता है. मानते हैं कि इसे सुनने से मृतक की आत्मा को शांति मिलती है. आत्मा को यह समझने में मदद मिलती है कि अब उसका शरीर से मोह समाप्त हो चुका है. उसे अब आगे बढ़ना है. वैसे हिंदू मान्यताएं हैं कि मृत्यु के बाद आत्मा 13 दिनों तक घर में ही मंडराती रहती है. जब वो ये पाठ सुनती है तो फिर नई यात्रा पर निकल जाती है.
गरुण पुराण उसे मृत्यु के बाद आगे की यात्रा के बारे में बताती है. इसी वजह से गरुण पुराण का पाठ मृतक के लिए किया जाता है, लेकिन इसका उद्देश्य जीवित लोगों को भी शिक्षित करना होता है. इसके जरिए कर्मों के महत्व, मोह का त्याग के साथ पाप – पुण्य के बारे में बताया जाता है.

मृत्यु के बाद घर का वातावरण बहुत भारी और दुखी होता है. 13 दिनों तक गरुड़ पुराण के नियमित पाठ से घर में एक आध्यात्मिक ऊर्जा आती है. ये धीरे-धीरे उनके दुख को कम करने में मदद करता है. ये भी मानते हैं कि इसके पाठ से मृतक के अनजाने में किए गए पापों का प्रभाव कम होता है.
क्या आत्मा मृत्यु के बाद भी घर में रहती है
भारतीय ग्रंथों में ये कहा गया है कि आत्मा मृत्यु के तुरंत बाद ये स्वीकार नहीं कर पाती कि उसका शरीर अब निर्जीव हो चुका है और जिस घर में उसने लंबा समय गुजारा, उसे छोड़ अब उसे जाना होगा. जब वह प्रियजनों को रोते हुए देखती है तो उन्हें सांत्वना देने की कोशिश करती है, लेकिन सूक्ष्म शरीर में होने के कारण संवाद नहीं कर पाती.
शास्त्र कहते हैं कि मृत्यु के बाद भी आत्मा मोह से छूट नहीं पाती. यही वजह उसे मृत्यु के बाद भी घर की सीमाओं से बांधे रखती है. गरुड़ पुराण में कहा गया है कि दाह संस्कार से पहले तक आत्मा अपने पुराने शरीर को देखकर दुखी होती है. उसमें वापस लौटने की भी कोशिश करती है लेकिन ऐसा नहीं कर पाती. दाह संस्कार के बाद भी अक्सर वह घर में मंडरा सकती है. इसी वजह से गरुण पुराण के जरिए उसके मोह को खत्म करते हैं और शांति देने के काम के साथ आगे की यात्रा के लिए ऊर्जा दी जाती है.

10वें से 13वें दिन के अनुष्ठानों के बाद ही आत्मा का सूक्ष्म शरीर पितृलोक या यमलोक की लंबी यात्रा के लिए सक्षम हो जाता है. कह सकते हैं कि 13 दिनों का समय एक ‘बफर पीरियड’ की तरह है जहां आत्मा को धीरे-धीरे संसार से विमुख होने के लिए तैयार किया जाता है.
13वें दिन के बाद क्या होता है?
हिंदू मान्यताओं के अनुसार मृत्यु के बाद के पहले 10 दिन आत्मा के ‘सूक्ष्म शरीर’ के अंगों के निर्माण के लिए होते हैं, जो पिंडदान के माध्यम से बनते हैं. 11वें और 12वें दिन वह भोजन और ऊर्जा ग्रहण करती है. 13वें दिन ‘सपिंडीकरण’ की पूजा होती है, जहां मृतक का पिंड पितरों के पिंड के साथ मिला दिया जाता है. बस इसी दिन से आत्मा अपनी नई ऊर्जा शुरू कर देती है. मोह का बंधन टूट जाता है.
किसने लिखा ये गरुड़ पुराण
माना जाता है भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ जी ने ये ज्ञान उनसे हासिल किया. फिर इसे ऋषि-मुनियों को सुनाया. दरअसल एक बार गरुड़ जी ने भगवान विष्णु से मृत्यु के बाद की गति, यमलोक, पुनर्जन्म, स्वर्ग-नरक आदि के बारे में गहरे सवाल पूछे. भगवान विष्णु ने सभी का विस्तार से जवाब दिया. बाद में गरुड़ जी ने ये ज्ञान अपने पिता महर्षि कश्यप को सुनाया. वैसे इसे पुराण के रूप में संकलित करके ग्रंथ का रूप देने का काम महर्षि वेदव्यास ने किया.

वेदव्यास ने सभी 18 महापुराणों की रचना की थी. उन्होंने ही वेदों के ज्ञान को समझने योग्य कथाओं के रूप में लिखा. वैसे गरुण पुराण का मौजूदा स्वरूप 8वीं से 11वीं शताब्दी के बीच संपादित माना जाता है.
हिंदू धर्म की कई शाखाएं इसे नहीं भी मानतीं
हां, भारत में हिंदू धर्म की कई ऐसी शाखाएं, समुदाय और परंपराएं हैं जहां मृत्यु के बाद गरुण पुराण के पाठ की प्रथा का पालन नहीं होता. जैसे आर्य समाज पुराणों को प्रामाणिक नहीं मानता, बल्कि केवल वेदों को ही प्रमाण मानता है. वे मृत्यु के बाद की रस्मों में यज्ञ, वैदिक मंत्रों का पाठ और सत्संग पर जोर देते हैं.
शैव परंपराओं में भी मृत्यु के बाद शिव की महिमा, वचन पढ़े और सुने जाते हैं.
जनजातीय समूह भी बेशक खुद को हिंदू मानते हों लेकिन मृत्यु के बाद उनकी भी परंपराएं अलग हैं. केरल में भी मृत्यु के बाद की कई समुदायों में गुरुड़ पुराण नहीं पढ़ते.
गरुड़ पुराण में कितने खंड
गरुड़ पुराण को मुख्य रूप से दो प्रमुख भागों में है. इसमें भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सदाचार, यज्ञ, दान, तप और आयुर्वेद के बारे में बताया गया है. ये अगर जीने की कला सिखाता है तो उत्तर खंड मृत्यु के बाद की स्थितियों, नरक, यमलोक की यात्रा, पिंडदान और मोक्ष के बारे में बताता है. कुल मिलाकर लगभग 19,000 श्लोक हैं. इसमें स्वर्ग-नरक और अगले जन्म के बारे में भी बताया गया है.
किन धर्मों में मानते हैं कि मृत्यु के बाद आत्मा आसपास रहती है
इस्लाम में मान्यता है कि मृत्यु के बाद और दफन किए जाने तक रूह आसपास ही रहती है. ऐसी मान्यता है कि दफन के बाद जब लोग कब्र से 40 कदम दूर चले जाते हैं, तब फरिश्ते सवाल-जवाब के लिए आते हैं. कई संस्कृतियों में मृत्यु के बाद तीसरे, दसवें और 40वें दिन की रस्म इसी विश्वास पर आधारित है कि रूह का जुड़ाव बना रहता है.

तिब्बती बौद्ध धर्म में ‘बारदो’ की अवधारणा है. माना जाता है कि मृत्यु के बाद और अगले जन्म के बीच 49 दिनों का एक अंतराल होता है. इन 49 दिनों में आत्मा एक मध्यवर्ती स्थिति में रहती है. अक्सर अपने घर या शरीर के आसपास मंडराती है. इसीलिए तिब्बती ‘बुक ऑफ द डेड’ का पाठ किया जाता है ताकि आत्मा को सही दिशा दिखाई जा सके. ये बिल्कुल गरुड़ पुराण की ही तरह है.
ईसाई धर्म में आधिकारिक चर्च की शिक्षाएं तो यही कहती हैं कि मृत्यु के बाद आत्मा तुरंत न्याय के लिए ईश्वर के पास चली जाती है लेकिन कई ईसाई संस्कृतियों विशेषकर कैथोलिक और ऑर्थोडॉक्स में माना जाता है कि आत्मा को शांति मिलने में कुछ समय लगता है.
मेक्सिको जैसे देशों में ‘डे ऑफ द डेड’ मनाया जाता है, जहां यह माना जाता है कि पूर्वजों की आत्माएं साल में एक बार अपने घर लौटती हैं.
पारसी धर्म में स्पष्ट रूप से माना जाता है कि मृत्यु के बाद आत्मा 3 दिनों तक शरीर के पास या घर में ही रहती है. चौथे दिन की सुबह ‘चिनवत पुल’ पार करने के लिए आत्मा आगे बढ़ती है. इन तीन दिनों तक घर में दीया जलाया जाता है. प्रार्थना की जाती है ताकि आत्मा सुरक्षित रहे. हर धर्म मानता है कि चेतना एक झटके में खत्म नहीं होती, उसे भौतिक जगत से पूरी तरह अलग होने में समय लगता है.
प्राचीन मिस्र में क्या करते थे
प्राचीन मिस्र के लोग तो इस पर इतना यकीन करते थे कि वे मृत शरीर के पास खाना, गहने और नक्शे रख देते थे ताकि आत्मा को घर के आसपास रहने और फिर आगे की यात्रा में कोई दिक्कत न हो.







