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वैरागी: आखिर क्यों लड़कियों ने किया सांसारिक जीवन का त्याग? बन गई साध्वी, कोरोना में मौत से आहत था मन



 पाली. कोरोना के विकराल रूप ने मानवता तो तार-तार कर दिया था. भयावह समय की गवाह बनी राजस्थान की तीन बहनों का हृदय परिवर्तन हो गया. तीनों ने अब सांसारिक मार्ग को छोड़कर साध्वी बनने का निर्णय लिया है. तीनों बहनों ने संयम पथ पर आगे बढ़ने के लिए वैराग्य पथ को चुना है. पढ़ाई में होशियार और अपने परिवार की तीनों लाडली बेटियों ने न केवल वैराग्य पथ को चुना बल्कि इस मार्ग को अपनाने से पहले साध्वियों के साथ समय भी बिताया. तीनो बहनों ने 5 हजार किलोमीटर तक धार्मिक यात्राएं भी की. अब तीनों बेटियां 16 फरवरी को बाड़मेर में दीक्षा लेंगी.

 बनना चाहती थी लेक्चरर मगर फिर बदल दिया इरादा
 जीवन में कई क्षण ऐसे ऐसे आते हैं जो आदमी को अंदर से बदलने पर मजबूर कर देता है. बाड़मेर की रहने वाली निशा बोथरा के जीवन में ऐसा ही क्षण आया. निशा बोथरा बताती हैं कि बीकॉम करने के बाद लेक्चरर बनना चाहती थीं. वर्ष 2020 में कोविड के दौरान साध्वी विद्युतप्रभा के संपर्क में आने पर मन बदल गया. प्रवचन सुनकर लगा कि कोविड में जिस तरह लोग मर रहे हैं, एक दिन वह भी इस दुनिया से चली जाएगी. मोक्ष प्राप्त करने और आंतरिक खुशी के लिए संयम पथ ही सबसे अच्छा है. करीब डेढ़ साल तक साध्वी विद्युतप्रभा और साध्वी दीप्तिप्रभा के पास आती-जाती रहीं.

साक्षी सिंघवी ने इस तरह चुना वैराग्य पथ का मार्ग
सांचोर जिले के महावीर कॉलोनी दादावाड़ी की रहने वाली साक्षी सिंघवी जो कि अशोक सिंघवी की पुत्री है और तीन भाई-बहनो में सबसे छोटी बहन है. साक्षी पढ़ाई में होशियार थीं. वर्ष 2020 में कोरोना के कारण पढ़ाई में गैप आया तो अपनी मां मंजू देवी के कहने पर साक्षी बेंगलूरू में हो रहे साध्वी दीप्ति प्रभा के चातुर्मास में उनसे मिलने गई. साक्षी ने यहां 10 दिनों तक समय बिताया. इस दौरान वह साध्वियों के जीवन, उनके धर्म और ध्यान से इस तरह प्रभावित हुई कि उसे लगा कि सांसारिक जीवन व्यर्थ है. मोक्ष प्राप्ति का सही रास्ता तो धर्म-ध्यान और प्रभु की आराधना है. वे दस दिन की बजाए सवा तीन महीना रह गई. घर वापस लौटकर 2021 में बीएससी की पढ़ाई पूरी की. जब लगा कि पढ़ाई से ज्यादा धर्म और ध्यान में मन  रम गया है तो उन्होंने तय किया कि सांसारिक जीवन त्याग कर साध्वी बनना है.

नहीं मानी मां की बात, जिद पर अड़ी रही
करीब 8 महीने पहले मां मंजूदेवी को बताया, लेकिन वे राजी नहीं हुईं. मां बोली ‘रास्ता काफी कठिन है.’ उन्होंने हार नहीं मानी और मां व दोनों भाइयों को मना लिया. साक्षी ने पैदल 2 हजार किलोमीटर से ज्यादा का विहार भी किया, जिसमें गिरनार नवाणु यात्रा भी शामिल है.

भावना ने कहा शुरू से ही रही हूं धार्मिक प्रवृति में
 बाडमेर जिले की ही रहने वाली भावना ने बताया कि वह शुरू से ही धार्मिक प्रवृति की रही है. जब से उन्होने होश संभाला तब से स्थानक जाना शुंरू किया. संतो के प्रवचन सुनने से लेकर वहां समय बिताना अच्छा लगता था. मन में वैराग्य भाव जाग रहा था और जब साध्वी नित्यप्रभा और विद्युतप्रभा से मिली तो वैराग्य लेने का भाव और मजबूत हो गया. भावना कहती है कि करीब पांच साल पहले हिम्मत कर घर पर अपनी इच्छा जाहिर कर दी. मां प्यारी देवी राजी हो गई, लेकिन पिता सोहनलाल ने मना कर दिया. मेरी इच्छा देखने के बाद वे भी मान गए. करीब चार साल तक गुरुकुलवास में रही.

5 हजार किलोमीटर पैदल धार्मिक यात्रा कर चुकी भावना
भावना ने साध्वियों के साथ करीब 5 हजार किलोमीटर तक पैदल धार्मिक यात्रा की. इनमें नवाणु यात्रा पालीताणा, गिरनार भी शामिल है. बीए तक की पढ़ाई की है. पिता शेयर मार्केट में ब्रोकर है. चार भाई बहनों में भावना तीसरे नंबर की है. दो भाई और दो बहन हैं. साध्वियों के साथ रहने पर ऐसा लगा कि सांसारिक जीवन दिखावे का है. मोक्ष के लिए मन को संयम पथ पर अग्रसर होना ही होगा, इसलिए दीक्षा लेने की ठानी.

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