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होलिका दहन 2026: कब किया जा रहा होलिका दहन? जानें इस दिन क्यों जलाई जाती है लकड़ी? नोट करें शुभ मुहूर्त


Holika Dahan 2026 Date: फाल्गुन की शामें जैसे-जैसे नज़दीक आती हैं, मोहल्लों में एक अलग-सी हलचल दिखने लगती है. कहीं बच्चे लकड़ियां जमा कर रहे हैं, तो कहीं महिलाएं घर की साफ-सफाई में जुटी हैं. लेकिन इस बार एक सवाल लोगों को थोड़ा उलझा रहा है आखिर होलिका दहन 2026 कब होगा? 2 मार्च या 3 मार्च? और हर साल इस दिन लकड़ी क्यों जलाई जाती है? ज्योतिषीय गणना, भद्रा काल और चंद्र ग्रहण की चर्चा के बीच आम लोग सही जानकारी जानना चाहते हैं. आइए, विस्तार से समझते हैं कि Holika Dahan 2026 की सही तारीख क्या है और इस परंपरा का अर्थ क्या है. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा.

धार्मिक मान्यता है कि पूर्णिमा की रात शुभ मुहूर्त में होलिका दहन किया जाता है. अलग-अलग शहरों में मुहूर्त थोड़ा बदल सकता है, इसलिए लोग स्थानीय पंचांग या मंदिर की सूचना के अनुसार समय तय करते हैं. गांवों में तो इस दिन का अलग ही माहौल होता है. बच्चे कई दिन पहले से लकड़ियां इकट्ठी करने लगते हैं. शहरों में भी कॉलोनियों के पार्कों में लकड़ी का ढेर सजता दिख जाता है. यह सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि सामूहिक उत्सव की शुरुआत है.

holika dahan 2026 kab hai?
हिंदू पंचांग के अनुसार होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की प्रदोष काल में किया जाता है, लेकिन शर्त यह है कि उस समय भद्रा का साया न हो. साल 2026 में 2 मार्च की शाम को पूर्णिमा तिथि और प्रदोष काल तो रहेगा, मगर उस दौरान भद्रा का प्रभाव रहेगा. ज्योतिषविदों के अनुसार भद्रा में होलिका दहन करना शुभ नहीं माना जाता.

3 मार्च क्यों है ज्यादा अनुकूल?
3 मार्च को भद्रा का साया नहीं रहेगा. हालांकि शाम के समय पूर्णिमा तिथि नहीं होगी और चंद्र ग्रहण का प्रभाव भी रहेगा, लेकिन ग्रहण शाम 6 बजकर 46 मिनट पर समाप्त हो जाएगा. उदिया तिथि में पूर्णिमा होने के कारण 3 मार्च की शाम को होलिका दहन करना अधिक उपयुक्त माना जा रहा है.

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3 मार्च का शुभ मुहूर्त
इस वर्ष 3 मार्च को होलिका दहन का शुभ मुहूर्त शाम 6:46 बजे से रात 8:00 बजे तक रहेगा. परंपरा के अनुसार प्रदोष काल में दहन करना श्रेष्ठ माना जाता है, भले ही उस समय पूर्णिमा तिथि पूरी तरह न हो. हालांकि, जो लोग 2 मार्च को ही दहन करना चाहते हैं, वे भद्रा समाप्त होने के बाद या पुंछ भद्रा में यह अनुष्ठान कर सकते हैं. गांवों में अक्सर लोग स्थानीय पंडित की सलाह से समय तय करते हैं, जबकि शहरों में मंदिरों की घोषणा के अनुसार कार्यक्रम रखा जाता है.

holika dahan ke din lakdi kyun jalaate hai?
होलिका दहन का आधार भक्त प्रह्लाद और उसकी बुआ होलिका की पौराणिक कथा है. कथा के अनुसार, होलिका को आग में न जलने का वरदान था. उसने प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठने का प्रयास किया, लेकिन अंत में स्वयं जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच गए. यह घटना बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक मानी जाती है. लकड़ी जलाना उसी घटना का प्रतीकात्मक रूप है अहंकार, अन्याय और नकारात्मकता को अग्नि में समर्पित करना.

सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थ
ग्रामीण इलाकों में होलिका दहन नई फसल से भी जुड़ा है. किसान गेहूं की बालियां अग्नि में अर्पित करते हैं और अच्छी पैदावार की कामना करते हैं. शहरों में लोग इस दिन पुराने मनमुटाव को खत्म करने का संकल्प लेते हैं. आजकल पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए कई जगह छोटी और प्रतीकात्मक होलिका जलाई जाती है. कुछ सोसायटियों में सूखी टहनियों और गोबर के उपलों का उपयोग किया जाता है. यह परंपरा को निभाने के साथ प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का संकेत भी है.

4 मार्च को होगी धुलेंडी
3 मार्च की शाम होलिका दहन के बाद 4 मार्च की सुबह रंगों वाली होली यानी धुलेंडी मनाई जाएगी. यही वह दिन है जब लोग गुलाल, रंग और मिठाइयों के साथ रिश्तों में मिठास घोलते हैं.

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