करौली. हिंदू धर्म में प्रत्येक मास का अपना एक विशेष आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व होता है, लेकिन इन सभी महीनों में मलमास को एक अलग स्थान प्राप्त है. मलमास को शास्त्रों में ऐसा काल माना गया है, जिसमें शुभ और मांगलिक कार्यों पर पूर्णता रोक रहती है. जबकि साधना, दान और पुण्य कर्मों का विशेष महत्व बढ़ जाता है. इसी कारण इसे संयम, तप और आत्मशुद्धि का महीना भी कहा जाता है. ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार इस वर्ष का आखिरी मलमास 15 दिसंबर से आरंभ होकर 14 जनवरी तक रहेगा.
करौली के आध्यात्मिक गुरु एवं ज्योतिषाचार्य पं. हरिमोहन शर्मा ने बताया कि मलमास वर्ष में सामान्यतः दो बार आता है और इसे खगोलीय व ज्योतिषीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. उनका कहना है कि इस अवधि के दौरान हिंदू धर्म में सभी प्रकार के शुभ और मांगलिक कार्यों पर पूर्ण रूप से रोक रहती है.
सामान्य स्थिति में रहते हैं गुरू ग्रह
पं. हरिमोहन शर्मा के अनुसार, मलमास के दौरान विवाह, उपनयन संस्कार, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण जैसे संस्कार नहीं किए जाते. धार्मिक मान्यता है कि इस समय किए गए शुभ कार्यों का अपेक्षित फल नहीं मिलता, इसलिए शास्त्रों में इन कार्यों को टालने की सलाह दी गई है. यही कारण है कि समाज में इस महीने को लेकर विशेष सावधानी बरती जाती है. मलमास के दौरान शुभ कार्यों पर रोक लगने का मुख्य कारण गुरु ग्रह की स्थिति को माना जाता है. उन्होंने बताया कि इस समय गुरु ग्रह सामान्य या निष्क्रिय अवस्था में रहते हैं, जबकि सूर्य देव धनु राशि में गोचर करते हैं. गुरु को शुभता, विवाह और मांगलिक कार्यों का कारक ग्रह माना जाता है, ऐसे में उनकी अनुकूल स्थिति न होने के कारण इन कार्यों को स्थगित रखना ही शास्त्रसम्मत माना गया है.
मलमास में अवश्य करें ये पुण्य कर्म
हालांकि मलमास में शुभ कार्य वर्जित होते हैं, लेकिन यह समय धार्मिक साधना और आत्मिक उन्नति के लिए अत्यंत उत्तम माना गया है. पं. हरिमोहन शर्मा के अनुसार, इस महीने में व्यक्ति को अधिक से अधिक जप, तप, पूजा-पाठ, हवन, यज्ञ, दान और पुण्य कर्म करने चाहिए. विशेष रूप से भगवान विष्णु की आराधना, गीता पाठ, राम नाम जप और कथा श्रवण को इस मास में श्रेष्ठ बताया गया है. उन्होंने बताया कि मलमास में किया गया दान-पुण्य कई गुना फल देने वाला होता है. इस अवधि में अन्न दान, वस्त्र दान, गौ सेवा, गरीबों और जरूरतमंदों की सहायता करना अत्यंत शुभ माना जाता है. शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि इस महीने में दान देना ही नहीं, बल्कि दान स्वीकार करना भी पुण्यकारी होता है.
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