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5 दिन, 75 KM और ‘नर्मदे हर’ के जयघोष…नर्मदा तट बिना गए निकली अनोखी नवग्रह पंचकोसी पदयात्रा


दीपक पांडेय, खरगोन: कड़ाके की ठंड, सिर पर कपड़ों और खाने-पीने की पोटली, हाथ में लाठी और जुबान पर “नर्मदे हर”… सोमवार 15 दिसंबर की सुबह मध्यप्रदेश के खरगोन में आस्था का ऐसा नजारा देखने को मिला, जिसने हर किसी को भावुक कर दिया. करीब 5 हजार से ज्यादा श्रद्धालु 5 दिवसीय नवग्रह पंचकोसी पदयात्रा पर निकल पड़े. यह यात्रा 19 दिसंबर को संपन्न होगी. इस साल यात्रा का 18वां वर्ष है.

सबसे खास बात यह है कि यह संभवतः प्रदेश की इकलौती पंचकोसी यात्रा है, जिसमें पूरे रास्ते “नर्मदे हर” के जयघोष तो गूंजते हैं, लेकिन न कोई यात्री नर्मदा तट जाता है, न स्नान होता है और न ही नर्मदा दर्शन. इसके बावजूद श्रद्धालु पूरे समर्पण भाव से यात्रा करते हैं. इस पदयात्रा का उद्देश्य है नवग्रहों की शांति और निमाड़ अंचल की खुशहाली.

यह यात्रा शैव संप्रदाय के तत्वावधान में संत पूर्णानंद महाराज और संत बोंदरू बाबा की स्मृति में निकाली जाती है. यात्रा में शामिल होने के लिए प्रदेश के कई जिलों से श्रद्धालु रविवार शाम को ही खरगोन स्थित नवग्रह मंदिर पहुंच गए थे. सोमवार सुबह करीब 8 बजे, देश के इकलौते सूर्य प्रधान नवग्रह मंदिर में ओंकार ध्वज पूजन, मां नर्मदा और नवग्रहों की विधिवत पूजा-अर्चना के बाद पदयात्रा का शुभारंभ हुआ. ध्वजवाहक रहे महाराजा वाले नर्मदे हर बाबा. यात्रा में बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग सभी शामिल रहे.

कितनी लंबी है यह अनोखी यात्रा?
करीब 75 किलोमीटर लंबी इस पदयात्रा में श्रद्धालु 20 से अधिक गांवों से होकर गुजरते हैं. सैकड़ों मंदिरों और धार्मिक स्थलों के दर्शन करते हैं, लेकिन नर्मदा तट से दूरी बनाए रखते हुए भी पूरी यात्रा में नर्मदा के नाम का जयघोष चलता रहता है.

कैसे हुई शुरुआत?
इस अनूठी यात्रा की शुरुआत 2008 में डॉ. रविंद्र भारती चौरे की प्रेरणा से हुई थी. उन्होंने उन श्रद्धालुओं के लिए पंचकोसी यात्राओं की परंपरा शुरू की, जो लंबी नर्मदा परिक्रमा नहीं कर सकते. उनकी प्रेरणा से प्रदेश में करीब 25 पंचकोसी यात्राएं शुरू हुईं. नवग्रह पंचकोसी पदयात्रा भी उन्हीं में से एक है, जो उनके निधन के बाद खरगोन में नवग्रह शांति के उद्देश्य से शुरू की गई.

यात्रा में शामिल होने का अनुभव
करही गांव से आए श्रद्धालु सुखदेव बताते हैं कि यह उनकी दूसरी यात्रा है. उनके अनुसार इस यात्रा से मानसिक तनाव दूर होता है और मन को शांति मिलती है. वहीं शेरू शिवराम यादव कहते हैं कि घर वाले सालों से आते थे, मैं पहली बार आया हूं. थकान का नाम नहीं, बस आनंद ही आनंद.

10 साल के बच्चे से लेकर 80 साल के बुजुर्ग
इस यात्रा में 10 साल के बच्चों से लेकर 80 साल तक के बुजुर्ग शामिल हैं. श्रद्धालु रास्ते भर भजन-कीर्तन करते हैं, नाचते-गाते चलते हैं. जगह-जगह सेवा भावी लोग खाने-पीने के स्टॉल लगाते हैं. धार जिले के कुक्षी-मनावर से आए गणपत कहते हैं कि इस यात्रा से नवग्रहों की विशेष कृपा मिलती है.

यात्रा के पड़ाव

15 दिसंबर: नवग्रह मंदिर से नागझिरी – संत बोंदरू बाबा समाधि

16 दिसंबर: उमरखली – मोटी माता मंदिर

17 दिसंबर: बड़घाट -महादेव मंदिर

18 दिसंबर: बेड़ियाव – संत पूर्णानंद बाबा समाधि

19 दिसंबर: नवग्रह मंदिर में समापन

नवग्रहों से क्या है संबंध?
यात्रा में नौ संत, नौ भजन मंडलियां और नौ प्रमुख धार्मिक स्थलों का विशेष महत्व है. हर वर्ग और समाज के लोग इसमें शामिल होते हैं, खासकर महिलाओं की संख्या अधिक रहती है. श्रद्धालुओं का मानना है कि यह यात्रा शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शांति देने के साथ-साथ नवग्रहों का आशीर्वाद भी दिलाती है.

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