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Aamlaki Ekadashi Vrat : हिंदू धर्म में हर महीने दो एकादशी पड़ती है. पहली कृष्ण पक्ष और दूसरा शुक्ल पक्ष में. फरवरी का महीना शुरू हो चुका है. इस माह में भी दो एकादशी हैं. इसी महीने में आमलकी एकादशी पड़ेगी. इस एकादशी पर व्रत से सभी पापों का नाश होता है. आंवले के पेड़ की पूजा का विधान है. आमलकी एकादशी को रंगभरी एकादशी के नाम से भी जानते हैं. Bharat.one ने इस बारे में काशी के पंडित संजय उपाध्याय से बात की. वे बताते हैं कि भगवान विष्णु की पूजा के दौरान उन्हें आंवले का फल भी जरूर अर्पण करना चाहिए. इससे मनोवांछित मुराद पूरी होती है.
Aamlaki Ekadashi Vrat (आमलकी एकादशी व्रत विधि) वाराणसी. सनातन धर्म में एकादशी के व्रत का विशेष महत्त्व है. हर महीने में दो एकादशी का व्रत होता है. पहला कृष्ण पक्ष और दूसरा शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को यह व्रत रखा जाता है. फरवरी महीने में भी दो एकादशी के व्रत हैं. इसी महीने में आमलकी एकादशी भी पड़ रही है. इस एकादशी के व्रत से सभी पापों का नाश होता है. फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी के नाम से जानते हैं. आमलकी एकादशी के दिन आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु का निवास होता है. इसलिए इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा से भगवान विष्णु के पूजन का फल मिलता है. आमलकी एकादशी को रंगभरी एकादशी के नाम से भी जानते हैं. Bharat.one से बात करते हुए काशी के ज्योतिषाचार्य पंडित संजय उपाध्याय बताते हैं कि 26 फरवरी को आमलकी एकादशी का व्रत रखा जाएगा.
क्या है पूजा का शुभ समय
आमलकी एकादशी पर ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए. उसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए. सनातन वैदिक पंचांग के अनुसार, इस दिन पूजा के लिए सुबह 6 बजकर 15 मिनट से लेकर 9 बजकर 40 मिनट तक का समय बेहद शुभ है. इस समय में भगवान विष्णु की पूजा के दौरान उन्हें आंवले का फल भी जरूर अर्पण करना चाहिए. इससे मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है.
बाघ को मनुष्य योनी
पंडित संजय उपाध्याय बताते हैं कि इस व्रत के प्रभाव से दैवत्य की प्राप्ति होती है. कथाओं के मुताबिक, इस व्रत के प्रभाव से ही व्याघ्र (बाघ) को मनुष्य की योनि प्राप्त हुई थी. इस व्रत से मनुष्य की आर्थिक समस्याएं भी दूर होती हैं और माता लक्ष्मी का आशीर्वाद उन्हें मिलता है. रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ माता गौरा का गवना कराते हैं. इस दौरान बाबा विश्वनाथ अपने भक्तों के साथ जमकर होली खेलते हैं. काशी में इस दिन से शुरू हुआ रंगोत्सव होली तक चलता है. सदियों से यह परम्परा चली आ रही है.
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