वाराणसी: मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भैरव अष्टमी मनाई जाती है. यह दिन भगवान भैरव की कृपा पाने के लिए खास होता है.भय, बाधा और संकट को दूर करने के लिए इस दिन लोग कालभैरव की पूजा करते है.इसे भैरव जयंती के नाम से भी जाना जाता है.भैरव को भगवान शंकर का रौद्र रूप माना जाता है.कालभैरव के उत्पत्ति की कहानी भी दिलचस्प है.आइये जानते है इसके बारे में काशी के ज्योतिषाचार्य पण्डित संजय उपाध्याय से…
पौराणिक कथा के अनुसार,एक बार त्रिदेव यानि ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शंकर) में सर्वश्रेष्ठ को लेकर बहस होने लगी.तीनों देव स्वयं को दूसरे से महान और श्रेष्ठ बताते रहे.तीनों में कौन श्रेष्ठ है जब इस बात का निर्णय नहीं हो पाया तो यह कार्य ऋषि-मुनियों को सौंपा गया. उन सभी ने सोच विचार के बाद भगवान शिव को सर्वश्रेष्ठ बताया.
ब्रह्मा जी का काटा सिर
लेकिन ऋषि-मुनियों की बातों को सुनकर ब्रह्मा जी क्रोधित हो गए.उनके क्रोध से एक सिर जलने लगा.अपने क्रोध में उन्होंने भगवान शिव का अपमान भी किया. इससे भगवान शंकर भी क्रोधित होकर अपने रौद्र रूप में आ गए जिससे काल भैरव की उत्पत्ति हुई.
काशी में समाप्त हुआ ब्रह्म हत्या का दोष
काल भैरव ने ब्रह्मा जी के घमंड को चूर करने के लिए उनके जलते हुए सिर को काट दिया.इससे उन पर ब्रह्म हत्या का दोष लग गया.जिसके बाद भगवान शिव ने उनको सभी तीर्थों का भ्रमण कर प्रायश्चित करने को कहा,जिसके बाद वे तीर्थ यात्रा पर निकल गए. पृथ्वी लोक पर सभी तीर्थों का भ्रमण करने के बाद वें काशी पहुंचे. काशी में वे ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्त हो गए और यही वें कोतवाल के रूप में विराजमान हो गए.ऐसी धार्मिक मान्यता है कि काशी में यम यातना नहीं मिलती.यहां कालभैरव लोगों ल अच्छे बुरे काम का फल देते है.
FIRST PUBLISHED : November 23, 2024, 10:09 IST
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