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Premanand Ji Maharaj : प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, पिता और संतान के कर्म एक-दूसरे से जुड़े होते हैं. अधर्म का असर परिवार पर पड़ता है, जबकि सच्चे कर्म आने वाली पीढ़ियों के लिए सुख और स्थिरता लाते हैं.
Premanand Ji Maharaj : अक्सर घर-परिवार की बातचीत में एक वाक्य ज़रूर सुनाई देता है “जैसा पिता, वैसी संतान.” यह सिर्फ कहावत नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक अनुभवों से निकला सच भी है. लेकिन क्या यह बात केवल संस्कारों तक सीमित है या कर्मों का हिसाब भी इसमें जुड़ा है? क्या पिता के पाप, गलत फैसले और अधर्म का बोझ बच्चों को भी उठाना पड़ता है? इन्हीं सवालों पर संत प्रेमानंद जी महाराज ने बेहद सरल लेकिन गहरे शब्दों में अपनी बात रखी है. उनका दृष्टिकोण न तो डर पैदा करता है, न ही भ्रम, बल्कि आत्ममंथन के लिए मजबूर करता है. आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में, जहां सफलता के लिए शॉर्टकट आम हो चुके हैं, यह समझना ज़रूरी है कि कर्म का असर केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता. यह परिवार, समाज और आने वाली पीढ़ियों तक फैलता है. यही कारण है कि प्रेमानंद जी महाराज के विचार आम लोगों के दिल को छूते हैं और सीधे ज़िंदगी से जुड़ जाते हैं.
पिता की भूमिका और कर्मों का असर
हर बच्चे के जीवन में पिता एक मजबूत आधार होते हैं. उनके निर्णय, व्यवहार और रोज़मर्रा की आदतें बच्चों के लिए अनजाने में ही सीख बन जाती हैं. अगर पिता ईमानदारी, संयम और सच्चाई के रास्ते पर चलता है, तो बच्चे भी उसी दिशा में बढ़ते हैं. वहीं, गलत रास्तों पर चलने वाला पिता जाने-अनजाने संतान के भविष्य को कठिन बना सकता है.
प्रेमानंद जी महाराज क्या कहते हैं?
प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, कर्म का सिद्धांत बहुत सीधा है. यदि पिता अधर्म, छल या गलत कमाई का सहारा लेता है, तो उसका प्रभाव संतान के जीवन में दुख, संघर्ष या मानसिक अशांति के रूप में सामने आ सकता है. यह दंड ईश्वर की सज़ा की तरह नहीं, बल्कि कर्मों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है.
जब संतान के कर्म पिता पर भारी पड़ते हैं
यह संबंध एकतरफा नहीं है. महाराज बताते हैं कि यदि संतान गलत रास्ते पर चलती है, तो समाज में पिता को अपमान और आलोचना झेलनी पड़ती है. लोगों के ताने, सवाल और संदेह पिता के मान-सम्मान को चोट पहुंचाते हैं. यानी कर्मों की ज़िम्मेदारी परिवार के भीतर घूमती रहती है.
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