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खेतों और तालाबों के किनारे पाए जाने वाले घोंघा को लोग बड़ा चाव से बनाने और खाते हैं. इसे सबसे शुद्ध मीट माना जाता है. इस सब्जी अच्छे से बनायी जाए तो स्वाद के सामने चिकन-मटन फेल होता है. खास बात यह है कि इसे घर पर आसानी से बनाया जा सकता है. रेसिपी जानने के लिए पढ़ें रिपोर्ट…
मधुबनीः बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में खेतों और तालाबों के किनारे पाया जाने वाला डोका (घोंघा या स्नेल) यहां का सबसे शुद्ध मीट माना जाता है. जिसे बड़ी संख्या में लोग चाव से बनाकर खाते हैं. डोका का स्वाद लगभग मटन जैसा ही होता है, लेकिन इसे पकाने की विधि थोड़ी अलग है. क्योंकि इसे खाने से पहले इसकी ऊपरी खोल को हटाना पड़ता है. यह खास प्रजाति का स्नेल गेहूं के खेतों, बारिश के मौसम में और कम पानी वाले तालाबों के किनारे आसानी से मिल जाता है. चूंकि यह केवल मिट्टी और पानी वाली जगहों पर पाया जाता है और सिर्फ मिट्टी खाता है, इसलिए इसे अत्यंत शुद्ध माना जाता है. यहां के किसान इसे चुनकर लाते हैं और बाजार में बेचते हैं, जहां आज इसकी कीमत ₹280 से ₹300 प्रति किलो तक है.
इसे बनाने की विधि जानें
डोका पकाने के लिए सबसे पहले इसे गर्म पानी में उबालते हैं, जिससे खोल से अंदर का मीट (मटन) निकल जाए. इस मीट के दो हिस्से होते हैं. एक नरम और दूसरा सख्त. नरम मीट को लहसुन, मिर्च और नमक के साथ फ्राई करके खाया जाता है, जबकि सख्त हिस्से का उपयोग मुख्य करी बनाने में होता है. करी बनाने के लिए इस सख्त मीट को प्याज, लहसुन, हल्दी, धनिया, मिर्च, सरसों तेल और नमक के साथ मिलाकर 10-20 मिनट के लिए मैरीनेट किया जाता है. इसके बाद कड़ाही में तेल, जीरा, तेज पत्ता और मिर्च को चटकाकर यह मिश्रण डाल दिया जाता है. इसे बिल्कुल धीमी आंच पर लगभग एक घंटे तक पकाया जाता है और बीच-बीच में कर्ची से चलाया जाता है. पक जाने पर इसे ग्रेवी के साथ या सूखा ही चावल-रोटी के साथ परोसा जा सकता है.
मिथिलांचल में चाव से बनाना और खाया जाता है
डोका या घोंघा मिथिलांचल के लगभग हर घर में खाया जाता है. इसे निकालने का तरीका थोड़ा श्रमसाध्य है, पर इसका स्वाद मटन से भी स्वादिष्ट माना जाता है. हालांकि बनाने में समय लगभग एक जैसा ही लगता है. इस मिट्टी खाने वाली प्रजाति को लोग केवल शुद्धता के लिए ही नहीं खाते, बल्कि इसकी ऊपरी खोल का उपयोग पूजा-पाठ में भी किया जाता है. कुल देवी की पूजा और मधुश्रावनी जैसे पर्वों में इसकी पूजा विशेष मानी जाती है. यह प्रजाति महीने भर तक मिट्टी में जिंदा रह सकती है, जो इसकी शुद्धता का प्रमाण माना जाता है.
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मीडिया में 6 साल का अनुभव है. करियर की शुरुआत ETV Bharat (बिहार) से बतौर कंटेंट एडिटर की थी, जहां 3 साल तक काम किया. पिछले 3 सालों से Network 18 के साथ हूं. यहां बिहार और झारखंड से जुड़ी खबरें पब्लिश करता हूं.
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https://hindi.news18.com/news/lifestyle/recipe-ghongha-ki-sabji-doka-meat-purity-and-taste-create-buzz-in-mithilanchal-local18-ws-kl-9955063.html







