Traditional Holi Food Recipe: होली आते ही घरों में सिर्फ रंगों की तैयारी नहीं होती, रसोई भी खास मूड में आ जाती है. कोई गुजिया के लिए खोया भून रहा होता है, तो कहीं कढ़ाही में पकौड़े छन रहे होते हैं, लेकिन राजस्थान और मालवा की बात अलग है. यहां होली का मतलब दाल-बाटी भी है. सुबह से ही आटा गूंथने की हलचल, घी की खुशबू और दाल में पड़ता तड़का… सब मिलकर त्योहार का असली स्वाद बनाते हैं. कई लोग सोचते हैं कि बाटी बनाना मुश्किल काम है, खासकर बिना तंदूर या कंडों की आग के. मगर अब वक्त बदल गया है. एक राजस्थानी महिला ने ऐसे दो आसान तरीके बताए हैं, जिनसे घर की रसोई में ही पारंपरिक स्वाद पाया जा सकता है.
होली पर क्यों बनती है दाल-बाटी?
राजस्थान और मालवा में होली के साथ दाल-बाटी का रिश्ता बहुत पुराना है. लोक मान्यता कहती है कि होलिका दहन की अग्नि में नई फसल का अंश अर्पित करने के बाद उससे बने व्यंजन का भोग लगाया जाता था. पुराने समय में गांवों में उपलों या कंडों की आग पर बाटी सेंकी जाती थी. यही वजह है कि होली की आग और बाटी का मेल स्वाभाविक माना गया. आज भी कई गांवों में होलिका दहन के बाद उसी आग की तपिश में बाटी सेंकने की परंपरा बची हुई है. यह सिर्फ खाना नहीं, एक सामूहिक अनुभव है. लोग साथ बैठते हैं, बाटी फोड़ते हैं, उस पर घी डालते हैं और दाल के साथ खाते हैं. यही मिलकर त्योहार की असली रौनक बनती है.
मारवाड़ी बाटी के लिए आटे की तैयारी
-स्वाद की असली नींव आटे से शुरू होती है. दो कप गेहूं का आटा लें और उसमें करीब एक चौथाई कप सूजी मिलाएं. अगर आटा मोटा पिसा हुआ है तो सूजी की जरूरत नहीं. इसमें आधा चम्मच नमक, दरदरा धनिया, अजवाइन, चुटकी भर मीठा सोडा और लगभग एक चौथाई कप घी डालें.
-अब असली काम शुरू होता है. घी को आटे में ऐसे मिलाएं कि जब आप मुट्ठी बांधें तो आटा दबकर आकार ले ले. यह छोटा सा टेस्ट बताता है कि घी सही मात्रा में है. कई घरों में दादी-नानी इसी तरीके से परखती थीं.
सख्त आटा गूंथना जरूरी
बाटी को खस्ता बनाना है तो आटा थोड़ा सख्त गूंथें. हल्का गुनगुना पानी डालते जाएं और धीरे-धीरे आटा तैयार करें. गूंथने के बाद इसे ढककर 10 मिनट के लिए रख दें. इससे आटा सेट हो जाता है. फिर एक बार दोबारा मसलें और छोटी-छोटी लोइयां बनाकर गोल आकार दें. बीच में हल्का सा दबा दें ताकि अंदर तक सही तरह से सिक सके.
पहला तरीका: अप्पे मेकर में खस्ता बाटी
-आजकल ज्यादातर घरों में अप्पे मेकर मिल जाता है. इसे घी से ग्रीस करें और हर खांचे में एक-एक बाटी रखें. ऊपर से थोड़ा घी लगा दें. ढक्कन लगाकर धीमी आंच पर पकाएं. हर कुछ मिनट में बाटी को पलटते रहें ताकि चारों तरफ से सुनहरी हो जाए.
-इस तरीके की खास बात यह है कि गैस कम लगती है और समय भी बचता है. स्वाद लगभग वैसा ही मिलता है जैसा कंडों की आग पर सेंकी बाटी में आता है. शहरों में रहने वाले लोग इस ट्रिक को खूब पसंद कर रहे हैं.
दूसरा तरीका: कुकर में पारंपरिक स्वाद
-अगर अप्पे मेकर नहीं है तो कुकर काम आएगा. सबसे पहले कुकर की सीटी और रबर निकाल दें. अंदर एक स्टैंड रखें और उसके ऊपर घी लगी प्लेट. कुकर को खाली ही कुछ मिनट प्री-हीट करें.
-अब प्लेट पर बाटी रखें और ढक्कन बंद कर दें. आंच धीमी रखें. बीच-बीच में ढक्कन खोलकर बाटी पलटें और हल्का घी लगाते रहें. करीब 20-25 मिनट में बाटी तैयार हो जाएगी. बाहर से कुरकुरी और अंदर से नरम.
-कई गृहिणियां बताती हैं कि पहली बार में थोड़ा अभ्यास लगता है, लेकिन एक-दो बार के बाद अंदाजा हो जाता है कि कितनी आंच रखनी है.
सर्व करने का असली अंदाज
-जब बाटी सिक जाए और उस पर हल्की दरार दिखने लगे तो समझिए तैयार है. अब इसे हल्का सा तोड़ें और गरम घी में डुबो दें. बाटी जितना घी सोखेगी, उतनी ही स्वादिष्ट लगेगी. साथ में पंचमेल दाल, लहसुन की चटनी और बैंगन का भर्ता हो तो बात ही अलग.
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