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Desi Liquor: जब एक ही तरीके से बनती है देसी और अंग्रेजी शराब, तो एक सस्ती और दूसरी महंगी क्यों?  


Desi Liquor: देसी शराब या देसी दारू की छवि एक ऐसे पेय की है, जिसे आम तौर पर स्लम एरिया, झुग्गी बस्तियों या ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग पीते हैं. बॉलीवुड फिल्मों में देसी शराब को अक्सर सफेद या संतरी रंग के पेय के रूप में दिखाया जाता है, जिसे बिना मिलावट के पिया जाता है. इसके विपरीत भारत में बनी विदेशी शराब (आईएमएफएल) यानी व्हिस्की, रम, वोदका, ब्रांडी और जिन जैसी स्पिरिट को बेहतर माना जाता है. देसी शराब की दुकानें या ठेके अक्सर उन क्षेत्रों में स्थित होते हैं जहां कम आय वर्ग के लोग रहते हैं. इसके विपरीत, अंग्रेजी (विदेशी) शराब की दुकानें सामान्यतः मध्यम वर्ग और उच्च आय वर्ग के लोगों के क्षेत्रों में पायी जाती हैं. देसी शराब का उत्पादन स्थानीय स्तर पर किया जाता है, जिसके कारण इसकी बिक्री और खपत का क्षेत्र मुख्य रूप से उसी राज्य तक सीमित होता है जहां यह बनती है. भारत में देसी शराब का सेवन करने वालों की संख्या काफी अधिक है.

स्वाद में अंतर लेकिन मेकिंग एक जैसी
यह तथ्य आश्चर्यचकित कर सकता है कि देसी और अंग्रेजी (विदेशी) शराब के निर्माण की विधि में कोई बुनियादी अंतर नहीं है. दोनों को बनाने का तरीका लगभग समान है. देसी शराब का निर्माण पारंपरिक रूप से दशकों पुरानी प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है. इसे मुख्य रूप से शीरे (Molasses) या अन्य कृषि उत्पादों का उपयोग करके बनाया जाता है. इसमें समुचित फर्मेटेशन और डिस्टिलेशन की प्रक्रिया पूरी की जाती है. देसी शराब आमतौर पर पॉलिथीन की थैलियों या प्लास्टिक की बोतलों में उपलब्ध होती है. देश के विभिन्न भागों में देसी शराब को अलग-अलग स्थानीय नामों से जाना जाता है. देसी शराब भी सरकारी नियमों का पालन करते हुए बनाई जाती है, जो लाइसेंसशुदा दुकान पर मिलती है. वहीं, देसी शराब ही अंग्रेजी शराब का शुरुआती फॉर्म है.

देसी दारू यानी प्योरिफाइड स्पिरिट
देसी शराब मूल रूप से एक प्रकार की शुद्ध की गई स्पिरिट (Purified Spirit) होती है. यहां तक कि अंग्रेजी (विदेशी) शराब बनाने वाली कंपनियां भी अपनी आवश्यकता के लिए स्पिरिट अक्सर देसी शराब उत्पादक कंपनियों से ही खरीदती हैं. देसी और अंग्रेजी शराब में स्वाद का अंतर मुख्य है. इस खरीदी गई स्पिरिट में बाद में विभिन्न प्रकार के फ्लेवर (स्वाद) मिलाकर अंग्रेजी शराब तैयार की जाती है. देसी शराब में किसी फ्लेवर का प्रयोग नहीं किया जाता है. इसलिए इसका स्वाद और गंध उसी मूल सामग्री का होता है जिससे यह बनी है. फ्लेवर न मिलाने के कारण देसी शराब का नाम आते ही मन में एक तीव्र गंध और कसैले (तेज) स्वाद वाली शराब की छवि बनती है. वहीं, अंग्रेजी शराब का जिक्र होने पर कांच की बोतल में आकर्षक पैकेजिंग में उपलब्ध प्रोडक्ट की तस्वीर सामने आती है.

देसी शराब को कंट्री लिकर या आईएमसीएल कहा जाता है, जिसका मतलब है इंडिया मेड कमर्शियल लिकर.

हर साल बढ़ रही इसकी बिक्री
भारत में बेची जाने वाली कुल शराब का एक बड़ा हिस्सा देसी शराब का होता है. एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में देसी शराब के लगभग 242 मिलियन केस (पेटी) की बिक्री होती है. यह आंकड़ा बताता है कि देश के कुल शराब उद्योग का 30 फीसदी से अधिक हिस्सा देसी शराब का है. देसी शराब की बिक्री हर साल 7 फीसदी की दर से बढ़ रही है. इसमें अल्कोहल (Alcohol) का अधिकतम प्रतिशत 42.5 फीसदी तक ही होता है. चूंकि देसी शराब को एक से अधिक बार डिस्टिल नहीं किया जाता है, इसलिए इसका सेवन स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है.

देसी शराब के प्रमुख ब्रांड
देसी शराब के बाजार में हीरो, जॉय, कैप्टन और दिल से सबसे बड़े और सबसे अधिक बिकने वाले ब्रांडों में से हैं. टॉल बॉय जैसे ब्रांड की पूर्वी राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल और झारखंड के बाजार में मजबूत हिस्सेदारी है. यह शराब पूरे देश में विभिन्न स्थानीय और आकर्षक नामों से भी बिकती है, जिनमें हीर रांझा, घूमर, जीएम संतरा और जीएम लिंबू पंच शामिल हैं. ये नाम इसकी घरेलू उत्पाद की प्रकृति को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं.

कौन हैं देसी दारू के प्रमुख निर्माता
भारत में देसी शराब के बाजार में एकाधिकार की स्थिति है, जहां लगभग एक दर्जन ब्रांड मिलकर बाजार के 30 फीसदी से अधिक हिस्से पर कब्जा रखते हैं. भारत के प्रमुख देसी शराब निर्माताओं में ग्लोबस स्पिरिट्स एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है. अन्य प्रमुख निर्माताओं में आईएफबी एग्रो लिमिटेड, हरियाणा डिस्टिलरीज लिमिटेड, एसोसिएटेड अल्कोहल एंड ब्रुअरीज लिमिटेड और पिकाडिली एग्रो इंडस्ट्रीज शामिल हैं.

दोनों की कीमतों में अंतर क्यों
देसी शराब और अंग्रेजी शराब दोनों मूल रूप से एक ही स्पिरिट बेस (शीरा/कृषि उत्पाद) से बनती हैं, लेकिन कीमत का अंतर अंतिम उत्पाद की गुणवत्ता और प्रोसेसिंग पर आता है. देसी शराब अक्सर सिंगल डिस्टिल्ड होती है. इसका उत्पादन कम लागत वाले शीरे या स्थानीय कृषि उत्पादों से होता है और इसमें अशुद्धियां (Impurities) अधिक हो सकती हैं, जिससे लागत कम रहती है. अंग्रेजी शराब में इस्तेमाल की जाने वाली स्पिरिट को उच्च स्तर तक शुद्ध किया जाता है और अक्सर कई बार डिस्टिल किया जाता है. इसके अलावा, स्वाद, गंध और रंग को बेहतर बनाने के लिए महंगे फ्लेवर, एडिटिव्स और ब्लेंडिंग सामग्री मिलाई जाती है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ जाती है.

पैकेजिंग, ब्रांडिंग और डिस्ट्रिब्यूशन लागत
कीमत में बड़े अंतर की वजह पैकिंग और ब्रांडिंग पर होने वाला खर्च भी है. देसी शराब की पैकेजिंग बहुत साधारण और सस्ती होती है, जैसे पॉलिथीन पाउच या प्लास्टिक की बोतलें. इसमें मार्केटिंग और ब्रांडिंग पर शून्य या बहुत कम खर्च होता है. अंग्रेजी शराब के लिए उच्च गुणवत्ता वाली कांच की बोतलें, आकर्षक लेबलिंग, सील और बेहतर कॉर्क का उपयोग होता है, जिसकी लागत अधिक होती है. इसके अलावा विस्तृत विज्ञापन और मार्केटिंग पर भारी खर्च किया जाता है, जो अंतिम कीमत में जुड़ जाता है.

हर राज्य की एक्साइज ड्यूटी अलग
भारत में शराब की कीमतों को प्रभावित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारक राज्य-स्तरीय टैक्स सिस्टम है. राज्य सरकारें अक्सर अंग्रेजी शराब पर देसी शराब की तुलना में बहुत अधिक एक्साइज ड्यूटी और अन्य शुल्क लगाती हैं. चूंकि IMFL को ‘प्रीमियम’ उत्पाद माना जाता है, इस पर टैक्स स्लैब अधिक होते हैं. IMFL की बिक्री, भंडारण और वितरण के लिए लाइसेंसिंग शुल्क भी देसी शराब की तुलना में अधिक हो सकता है. देसी शराब का लक्ष्य बाजार कम आय वर्ग होता है. इस वर्ग को सस्ती शराब उपलब्ध कराने के लिए इसे जानबूझकर कम कीमत पर बेचा जाता है ताकि यह सुलभ रहे. अंग्रेजी शराब का लक्ष्य मध्यम और उच्च आय वर्ग होता है. ये उपभोक्ता उच्च गुणवत्ता और प्रतिष्ठित ब्रांड के लिए अधिक कीमत चुकाने को तैयार होते हैं, जिससे कंपनियों को अधिक मार्जिन मिलता है.


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https://hindi.news18.com/news/knowledge/when-desi-and-foreign-liquor-are-made-in-same-way-then-why-is-one-cheaper-and-other-expensive-ws-kl-9845496.html

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