Last Updated:
Mooli ka Achar Recipe: भरतपुर के ग्रामीण इलाकों में सर्दियों के दौरान ताजी मूली से पारंपरिक देसी अचार बनाने की परंपरा है. राई, मेथी और सरसों के तेल से तैयार यह अचार न केवल स्वादिष्ट होता है बल्कि पाचन के लिए भी बहुत फायदेमंद माना जाता है. सही विधि और नमी हटाकर बनाया गया यह अचार साल भर तक खराब नहीं होता है.

भरतपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में सर्दियों के मौसम के साथ ही घर-घर में देसी अचार बनाने की पारंपरिक रौनक दिखाई देने लगती है. इन्हीं पारंपरिक स्वादों में सबसे खास नाम मूली के देसी अचार का है, जिसे ग्रामीण महिलाएं बड़े चाव से तैयार करती हैं और लोग इसे साल भर के लिए स्टोर कर लेते हैं. इस अचार की खासियत यह है कि इसे बनाने का एक निश्चित समय होता है, यदि सही समय पर इसे न बनाया जाए तो फिर पूरे साल इसके चटपटे स्वाद का इंतजार करना पड़ता है. कड़ाके की ठंड में मिलने वाली ताजी, मीठी और कड़क मूली ही इस अचार के असली स्वाद का आधार बनती है. पूरी तरह से देसी और पारंपरिक विधि से तैयार होने के कारण यह अचार लंबे समय तक सुरक्षित रहता है और जल्दी खराब नहीं होता है.

ग्रामीण क्षेत्रों में मूली का यह अचार न केवल भोजन का स्वाद बढ़ाता है, बल्कि इसे सेहत के लिहाज से भी अत्यंत फायदेमंद माना जाता है. गांव के बुजुर्गों का कहना है कि मूली का अचार पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में मदद करता है और सर्दियों के दौरान शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखने में भी सहायक होता है. यही कारण है कि भरतपुर के गांवों में आज भी महिलाएं अपनी दादी-नानी के बताए पुराने नुस्खों के अनुसार ही इसे तैयार करती हैं. मूली के इस देसी अचार को बनाने की विधि बहुत ही विशिष्ट होती है, जिसमें शुद्ध सरसों के तेल और स्थानीय मसालों का उपयोग किया जाता है, जो इसे बाजार में मिलने वाले अचारों से बिल्कुल अलग और शुद्ध बनाता है.

मूली का पारंपरिक अचार तैयार करने के लिए सबसे पहले ताजी, सफेद और कड़क मूली का चुनाव किया जाता है. इन मूलियों को अच्छी तरह धोकर और छीलकर लंबाई में पतले-पतले टुकड़ों में काट लिया जाता है. इसके बाद सबसे महत्वपूर्ण चरण आता है, जिसमें मूली के इन टुकड़ों को एक साफ कपड़े पर फैलाकर हल्की धूप में सुखाया जाता है. धूप में सुखाने की यह प्रक्रिया इसलिए जरूरी है ताकि मूली के भीतर मौजूद नमी पूरी तरह निकल जाए, जो अचार को लंबे समय तक खराब होने से बचाती है. जब मूली की नमी सूख जाती है, तब इसे एक बड़े बर्तन में डालकर इसमें स्वादानुसार नमक मिलाया जाता है, जो मसालों को सोखने और संरक्षण (preservation) में मदद करता है.
Add Bharat.one as
Preferred Source on Google

मसाले मिलाने की प्रक्रिया में सबसे पहले इसमें राई, सौंफ, मेथी दाना, लाल मिर्च पाउडर और हल्दी डाली जाती है. इसके पारंपरिक देसी स्वाद को और अधिक निखारने के लिए कुछ लोग इसमें हींग और कलौंजी का तड़का भी लगाते हैं. जब सभी मसाले मूली के टुकड़ों के साथ अच्छी तरह मिल जाते हैं, तब शुद्ध सरसों के तेल को धुआं उठने तक गर्म किया जाता है. तेल के पूरी तरह ठंडा होने के बाद ही इसे मूली और मसालों के मिश्रण में डाला जाता है. यह ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि मर्तबान में तेल का स्तर इतना हो कि मूली उसमें पूरी तरह डूबी रहे, जिससे अचार खराब न हो. अंत में इस तैयार मिश्रण को कांच या चीनी मिट्टी के बिल्कुल साफ और सूखे मर्तबान में भर दिया जाता है.

मर्तबान में भरने के बाद इसे पांच से सात दिन तक हल्की धूप में रखा जाता है. इस दौरान यह ध्यान रखना जरूरी है कि रोजाना एक साफ और सूखे चम्मच से अचार को ऊपर-नीचे हिलाते रहें, ताकि मसाले और तेल पूरी तरह एकसार हो जाएं. कुछ ही दिनों की इस प्रक्रिया के बाद मूली का देसी अचार पूरी तरह तैयार हो जाता है. इस पारंपरिक तरीके से बनाया गया अचार भरतपुर के ग्रामीण स्वाद की असली पहचान है, जिसे लोग रोटी, पराठे या सादे भोजन के साथ बड़े चाव से खाते हैं. यदि सर्दियों में इसे एक बार सही विधि से बना लिया जाए, तो पूरे साल इस बेहतरीन देसी स्वाद का आनंद उठाया जा सकता है.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
https://hindi.news18.com/photogallery/lifestyle/recipe-mooli-ka-achar-recipe-winter-special-local18-10125310.html

















