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तुम तो अपना कहते थे… जब प्रियजन की देखभाल घर पर बोझ बन जाए, दिल्ली के हजारों परिवारों का हाल, रिसर्च में चौंकाने वाला सच

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“तुम तो अपना कहते थे”..! मशहूर कवि कुमार विश्वास की ये पंक्तियां… दिल्ली के उन हजारों परिवारों पर सटीक बैठती हैं, जो अब खुद की देखभाल में सक्षम नहीं हैं, लेकिन फिर भी चुपचाप अपने परिजनों की देखभाल में जूझ रहे हैं. जबकि, सच्चाई ये है कि अब उनको खुद ही किसी अपने सहारे की जरूरत है. जब प्रियजन की देखभाल घर पर बोझ बन जाए, तो देखभाल करने वाले को शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक थकान महसूस हो सकती है. हालांकि, दिल्ली की तंग गलियों में कई ऐसे लोग भी हैं, जो अशिक्षित और अपनों के सताए हुए हैं. मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज के सामुदायिक चिकित्सा विभाग द्वारा बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल (BIRAC) के सहयोग से की गई रिसर्च ने इस छुपे हुए बोझ को उजागर किया है. यह अध्ययन दिखाता है कि जीवन-सीमा वाली बीमारियों से पीड़ित लोगों की घर पर देखभाल न केवल शारीरिक और मानसिक रूप से थकाने वाली है, बल्कि यह कई परिवारों को पीढ़ियों तक चलने वाली गरीबी में भी धकेल देती है.

रिसर्च प्रमुख और विभाग के फैकल्टी सदस्य पार्थ शर्मा के मुताबिक, विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि हर 1,000 वयस्कों में से 4 को पालीएटिव केयर की जरूरत है और पिछले तीन दशकों में गंभीर स्वास्थ्य-जनित पीड़ा 74% बढ़ गई है. यह वृद्धि सबसे तेज़ कम और मध्यम आय वाले देशों में हो रही है, जैसे कि भारत, जहां 80% से अधिक जरूरत केंद्रित है. कहा, अगर जल्दी कोई समाधान नहीं लाया गया, तो और अधिक परिवार चुपचाप अकेले जूझते रहेंगे.

चौंकाने वाले निष्कर्ष सामने आए

सितंबर 2024 से जनवरी 2025 के बीच, शोधकर्ताओं ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के गंगा विहार और गोकलपुरी क्षेत्रों में लगभग 55,000 लोगों वाले 9,600 घरों का सर्वेक्षण किया. निष्कर्ष चौंकाने वाले थे: 43,267 लोगों की स्क्रीनिंग में, हर 1,000 में से दो लोग ऐसे पाए गए जिन्हें घर पर पालीएटिव केयर (आखिरी समय की देखभाल) की आवश्यकता थी. इनमें अधिकतर बुजुर्ग पुरुष थे, जिनमें से कई अशिक्षित और पहले से ही बेरोजगार थे, जिनकी ज़िंदगी अब गंभीर बीमारियों और अपंगता के कारण पूरी तरह बदल गई थी.

इन बीमारियों की मार सबसे अधिक

स्ट्रोक और अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारियां: स्ट्रोक और अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारियां (67.8%) सबसे बड़ी वजह थीं, जिनके कारण करीब आधे मरीज पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो गए थे. मरीजों की रोजमर्रा की क्षमता को मापने वाले बार्थेल इंडेक्स पर औसत स्कोर केवल 33 था, जो गंभीर रूप से आत्मनिर्भरता की कमी को दर्शाता है.

दर्द: दर्द (51.1%) सबसे आम लक्षण था. इसके बाद थकावट (44.4%), उदासी (15.6%) और सांस लेने में दिक्कत (14.4%) की शिकायतें थीं. अधिकतर मरीज पिछले पांच वर्षों से इस बीमारी से जूझ रहे थे (61.1%), जबकि लगभग 30% को ये स्थिति 10 साल से अधिक हो चुकी थी. औसतन, मरीज 8.6 वर्षों से बीमार थे.

महिलाओं पर देखभाल का बोझ अधिक

देखभाल का बोझ सबसे ज्यादा महिलाओं पर पड़ा. 84% से अधिक देखभालकर्ता महिलाएं थीं, जिनकी औसत उम्र 46.5 वर्ष थी. इन महिलाओं में से 30% पत्नियां, 22% माताएं और 20% बहुएं थीं. चौंकाने वाली बात यह थी कि 83% महिलाएं बेरोजगार थीं, जिससे पता चलता है कि ऐसे परिवारों की आर्थिक स्थिति कितनी नाज़ुक होती है. इसका परिवारों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा.

गरीबी में धकेल गईं बीमारियां

हर 10 में से 6 परिवारों ने बताया कि उनकी जीवन गुणवत्ता गिर गई है, और हर 3 में से 1 परिवार को इलाज के लिए कर्ज लेना पड़ा. स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रति व्यक्ति आय का 58% खर्च हो रहा था, और पूरे परिवार की आय का 11% हिस्सा सिर्फ इलाज में जा रहा था, जबकि इन परिवारों में बहुतों के पास राशन कार्ड या पेंशन थी. फिर भी, केवल 15% परिवार ही सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा के दायरे में थे.

बीमारी ने बदल दिया पारिवारिक जीवन

– 42% परिवारों ने बताया कि उनका खान-पान खराब हो गया.
– 42% परिवारों ने त्योहार मनाना तक बंद कर दिया.
– 31% मामलों में देखभाल करने वाले की नौकरी पर असर पड़ा.
– 14% परिवारों में बच्चों को स्कूल छोड़ना पड़ा.
– 13% मामलों में घर के अन्य बीमार लोग इलाज से वंचित रह गए.
– कुछ परिवारों को गांव छोड़ना पड़ा या किराया न दे पाने से घर बदलना पड़ा.
– मनोरंजन और आराम जीवन से मानो गायब ही हो गया.


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https://hindi.news18.com/news/lifestyle/health-when-home-care-of-loved-one-becomes-a-heavy-cross-to-bear-delhi-research-reveals-hidden-burden-of-palliative-care-poverty-increased-ws-kln-9671465.html

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