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प्लास्टिक का इस्तेमाल कर सकता है आपके आने वाले बच्चे को बीमार? नई स्टडी में हुए खुलासे


प्लास्टिक मुख्य रूप से माइक्रोप्लास्टिक्स जिसमें 5 मिमी से कम आकार के छोटे कण होते हैं और  भ्रूण को एंडोक्राइन डिसरप्टर्स जैसे नुकसान पहुंचाते हैं, जिसमें हार्मोन बिगाड़ने का खतरा रहता है. ये कण हवा, पानी, भोजन और यहां तक कि ब्यूटी प्रोडक्टस से शरीर में एंट्री करते हैं और प्लेसेंटा को पार कर भ्रूण तक पहुंच जाते हैं.

हाल के एक अध्ययन के अनुसार, माइक्रोप्लास्टिक्स भ्रूण के प्रजनन तंत्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इससे वयस्क होने पर बांझपन या अन्य इससे जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं. शोध में पाया गया कि ये कण विकास प्रक्रियाओं को बाधित रोकते हैं. इससे न्यूरोटॉक्सिसिटी और सूजन जैसी समस्याएं शामिल है. खासतौर पर माइक्रोप्लास्टिक्स से भ्रूण की वृद्धि में रुकावट आती है और प्लेसेंटल डिसफंक्शन हो सकती है.

प्लास्टिक में फ्थैलेट्स जैसे रसायन होते हैं जो चिंताजनक हैं. एक अध्ययन में पाया गया कि गर्भावस्था के दौरान फ्थैलेट्स के संपर्क से नवजात शिशु के मेटाबोलिज्म पर असर पड़ता है. फ़्थैलेट्स ऐसे केमिकल कम्पाउंड हैं जो प्लास्टिक को लचीला, ट्रांसपेरेंट और टिकाऊ बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं. इन्हें प्लास्टिसाइज़र कहा जाता है. कपड़ों से लेकर खाने के पैकिंग मटीरियल तक ये पाए जाते हैं.

वॉशिंगटन पोस्ट से बात करते हुए एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी में बाल चिकित्सा एंडोक्रिनोलॉजी के प्रोफ़ेसर रॉड मिशेल ने कहा, “एक पुरुष होने के नाते, आपको विकास के एक महत्वपूर्ण दौर में मात्रा में टेस्टोस्टेरोन की ज़रूरत होती है. अगर आपको यह मिल जाए, तो आप अपने प्रजनन स्वास्थ्य को सामान्य रूप से नियंत्रित कर पाते हैं.”

लेकिन फ़्थैलेट्स एंटीएंड्रोजन के रूप में कार्य करते हैं, साफ शब्दों में कहें तो टेस्टोस्टेरोन के विकास को रोकते हैं. वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि फ़्थैलेट्स लेडिग कोशिकाओं के विकास को रोकते है, जो भ्रूण में टेस्टोस्टेरोन बनाती हैं.

साल 2005 में साइंटिस्ट और स्टेटस्टिक शन्ना स्वान ने एजीडी और फ़्थैलेट के संपर्क पर रिपोर्ट जारी की थी. इससे अमेरिका में 136 गर्भधारण करने वाली महिलाओं पर अध्ययन किया गया. इसमें स्वान ने पाया कि गर्भावस्था के दौरान फ़्थैलेट के उच्च स्तर वाली महिलाओं में छोटे एजीडी और छोटे जननांग देने वाले लड़कों को जन्म देने की संभावना अधिक होती है.

ह्ययुमन रिप्रोडक्टिव अपडेट की स्टडी के अनुसार , 1973 और 2018 के बीच शुक्राणुओं की संख्या में प्रति वर्ष 1.2 प्रतिशत की गिरावट आई है. पिछले 45 सालों में लगभग 50 प्रतिशत की गिरावट आई है.

शुक्राणुओं की संख्या को सीधे फ़्थैलेट के संपर्क से जोड़ना मुश्किल है. इसके लिए गर्भावस्था से लेकर युवावस्था तक स्पर्म को ट्रेक करना आसान होगा, लेकिन रिसर्चर को ऐसा मिला है कि कम एजीडी का संबंध स्पर्म काउंट पर पड़ता है. जिन पुरुषों में एजीडी लगभग दो इंच से कम होता है, उनमें स्पर्म की संख्या इतनी कम होने की संभावना सात गुना ज़्यादा होती है. साथ ही उन्हें बांझपन का खतरा होता है.

फ़्थैलेट का असर सिर्फ़ प्रजनन तंत्र की बात नहीं है. हार्मोन दिमाग के विकास को भी प्रभावित करते हैं. पिछले कुछ सालों में बढ़ते शोध ने गर्भावस्था के दौरान फ़्थैलेट के संपर्क और एडीएचडी व आईक्यू के बीच संबंध पाया है. नॉर्वे में माताओं और बच्चों पर किए गए एक अध्ययन में रिसर्चर्स ने पाया कि जिन माताओं में फ़्थैलेट का स्तर सबसे ज़्यादा था, उनके बच्चों में एडीएचडी होने की संभावना सबसे कम स्तर वाली माताओं की तुलना में तीन गुना ज़्यादा थी. न्यूयॉर्क शहर में इसी तरह के एक अध्ययन में पाया गया कि जिन माताओं में फ़्थैलेट का स्तर ज़्यादा था, उनके बच्चों का आईक्यू पॉइंट औसतन सात कम था.

यह पहचानना है कि फ़्थैलेट्स का कितना स्तर गंभीर ख़तरा पैदा करता है. द पोस्ट से बात करते हुए वाशिंगटन विश्वविद्यालय में बाल रोग की प्रोफ़ेसर शीला सत्यनारायण ने कहा, “हम हमेशा सामान्य आबादी के औसत से तुलना करते हैं. लेकिन कुछ लोगों के लिए हानिकारक है और कुछ पर नहीं है.”

इसी तरह बीपीए भ्रूण के विकास हार्मोनों को प्रभावित करता है. यह एस्ट्रोजन हार्मोन की नकल करता है. कुछ अध्ययनों में फीटेल ग्रोथ पर सीधा असर नहीं पाया गया. लेकिन गर्भावस्था में वजन बढ़ने और शिशु के शरीर के आकार पर बुरा प्रभाव पड़ता हैं.

भारत में ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स और सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल फ्थैलेट्स के इस्तेमाल को कंट्रोल करते हैं. साल 2025 में, कॉस्मेटिक नियमों में बड़े बदलाव हुए, लेकिन EU (1400 प्रतिबंध) की तुलना में कम सख्त हैं. पर्सनल केयर और घरेलू उत्पादों में इसका प्रबंधन है.

केंद्र फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) के विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में फ्थैलेट्स के मानक अच्छे हैं, लेकिन कार्यान्वयन में कमी है. CSE की एक रिपोर्ट में कहा गया कि बच्चों के उत्पादों में DEHP, DBP आदि पर 2017 से प्रतिबंध है. लेकिन डाइपर्स जैसे उत्पादों में DIBP जैसी अन्य फ्थैलेट्स पर कोई मानक नहीं है जो स्किन के संपर्क से जोखिम बढ़ता है. CSE के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. विनीत चतुरवे ने कहा, “BIS मानक बच्चों की सुरक्षा के लिए सकारात्मक हैं, लेकिन बाजार निगरानी बढ़ानी होगी ताकि सस्ते आयात किए गए खिलौने मानकों का उल्लंघन न करें.”

प्लास्टिक प्रदूषण के मानव प्रजनन पर प्रभावों पर दुनिया भर में सैकड़ों अध्ययन हो चुके हैं, लेकिन मानव भ्रूण पर केंद्रित शोध अभी उभरते चरण में हैं. साल 2020 से 2025 तक के प्रमुख अध्ययनों में कम से कम 50 से अधिक वैज्ञानिक पेपर पब्लिश हुए हैं. इनमें माइक्रोप्लास्टिक्स के प्लेसेंटा, फेटल मेकॉनियम (नवजात का पहला मल) और यहां तक कि टेस्टिकल्स में मौजूदगी को दर्शाते हैं.

इससे बचने के तरीके क्या हो सकते हैं

ताजा और अनप्रोसेस्ड भोजन चुनें. प्लास्टिक रैपर की बजाय वैक्स पेपर या पेपर टॉवल इस्तेमाल करें. मछली और समुद्री भोजन कम खाएं, क्योंकि उनमें माइक्रोप्लास्टिक्स जमा हो सकते हैं.

नंबर 3 या 7 वाले प्लास्टिक (फ्थैलेट्स युक्त) से बचें. ग्लास, सिरेमिक या धातु के कंटेनर इस्तेमाल करें. प्लास्टिक बोतलों को गर्म न करें, क्योंकि इससे रसायन लीक होते हैं.

माइक्रोबीड्स वाले कॉस्मेटिक्स (जैसे स्क्रब) न लें. रीयूजेबल वाटर बॉटल, कॉफी मग और ग्रॉसरी बैग अपनाएं.


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https://hindi.news18.com/news/lifestyle/health-can-plastic-make-your-unborn-child-sick-effect-on-human-embryo-9814505.html

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