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स्मार्टफोन की लत या मानसिक बीमारी? मोबाइल छीनने पर बच्चा हो जाए आक्रामक, तो समझिए खतरे की घंटी, समय रहते हो जाएं सतर्क – Uttar Pradesh News

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कौशांबी: आज के दौर में बच्चे हों या युवा, हर किसी के लिए स्मार्टफोन चलाना एक लत जैसा बन गया है. सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक, मोबाइल हमारी जिंदगी का अटूट हिस्सा बन चुका है. स्मार्टफोन की यह बढ़ती लत अब एक गंभीर चिंता का विषय बन गई है. आज का बच्चा किताबों की खुशबू, खेल के मैदानों की मस्ती और दोस्तों के साथ बिताने वाले समय को भूलकर मोबाइल की चमकदार स्क्रीन में कहीं खोता जा रहा है. तकनीक ने जहां बच्चों के लिए सीखने के नए रास्ते खोले हैं, वहीं इसके हद से ज्यादा इस्तेमाल ने एक बड़ी मुसीबत को जन्म दिया है. अब बच्चों में चिड़चिड़ापन और मानसिक असंतुलन साफ देखा जा सकता है. विशेषज्ञों और माता-पिता का मानना है कि स्क्रीन के सामने घंटों बिताने की वजह से बच्चे जिद्दी और सामाजिक रूप से अकेले होते जा रहे हैं. इसका सीधा बुरा असर उनकी पढ़ाई, शरीर और दिमाग पर पड़ रहा है.

व्यवहार में आ रहा है तेजी से बदलाव
मोबाइल गेम्स, सोशल मीडिया और लगातार वीडियो देखने की लत बच्चों के स्वभाव को पूरी तरह बदल रही है. स्क्रीन से हर वक्त जुड़े रहने के कारण बच्चों की एकाग्रता (Concentration) कम होती जा रही है. आजकल के बच्चों में छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करना, जिद्दी हो जाना, बड़ों की बात न मानना और अकेले रहना पसंद करने जैसे लक्षण तेजी से उभर रहे हैं. सबसे डरावनी स्थिति तब होती है जब उनसे मोबाइल वापस लिया जाता है. ऐसी स्थिति में बच्चे बेचैन हो जाते हैं, जोर-जोर से रोने लगते हैं या फिर बहुत ज्यादा आक्रामक व्यवहार करने लगते हैं.

दिमाग और शरीर पर पड़ रहा है बुरा असर
जानकारों का कहना है कि ज्यादा देर तक मोबाइल देखना बच्चों के कोमल दिमाग पर गहरा असर डालता है. मोबाइल की स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी (Blue Light) नींद में बाधा डालती है, जिससे बच्चों की नींद पूरी नहीं हो पाती. जब नींद अधूरी रहती है, तो शरीर में थकान बनी रहती है, चिड़चिड़ापन बढ़ता है और पढ़ाई में भी मन नहीं लगता. इसके अलावा, बाहर खेल-कूद न करने की वजह से बच्चों का शारीरिक विकास भी रुक रहा है. वे एक ऐसी काल्पनिक दुनिया में जीने लगे हैं जहां असली रिश्तों और धैर्य की कोई जगह नहीं बची है.

पेरेंट्स की व्यस्तता भी है एक बड़ी वजह
इस समस्या की एक बड़ी वजह हमारी बदलती जीवनशैली भी है. आजकल माता-पिता अपने काम में इतने व्यस्त रहते हैं कि बच्चों को शांत रखने के लिए खुद ही उनके हाथ में मोबाइल थमा देते हैं. शुरुआत में तो यह एक आसान तरीका लगता है, लेकिन धीरे-धीरे यही आदत बच्चों के लिए जी का जंजाल बन जाती है. बच्चा असली दुनिया से कट जाता है और उसके अंदर से भावनाएं और रिश्तों की कद्र कम होने लगती है.

डॉक्टर की सलाह, बच्चों को मोबाइल की लत से ऐसे बचाएं
बाल विशेषज्ञ डॉक्टर विश्व प्रकाश ने इस बारे में विस्तार से जानकारी दी है. उन्होंने बताया कि आज की दुनिया में मोबाइल हर किसी को अपना गुलाम बना रहा है. मोबाइल की रोशनी सीधे तौर पर आंखों को नुकसान पहुंचाती है. इसका सबसे बुरा असर छोटे बच्चों पर हो रहा है क्योंकि वे इसके आदि हो चुके हैं. उन्हें खाना खाने से लेकर पढ़ाई तक, हर काम में बस मोबाइल चाहिए.

डॉक्टर ने सलाह दी है कि बच्चों को मोबाइल से दूर रखने के लिए सबसे पहले माता-पिता को उनके सामने मोबाइल का इस्तेमाल कम करना होगा. छोटे बच्चों को कम से कम 2 से 3 साल की उम्र तक टीवी या मोबाइल की स्क्रीन बिल्कुल न दिखाएं. बच्चों के हाथ में मोबाइल देने के बजाय उनके साथ समय बिताएं, उनके साथ खेलें और उन्हें पढ़ाई में मदद करें. अगर घर के बड़े ही बच्चों को मोबाइल चलाना सिखाएंगे, तो उसका सीधा असर उनकी आंखों और दिमाग पर पड़ेगा. इससे बच्चा जिद्दी हो जाता है, सबसे दूरियां बनाने लगता है और वह शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर हो जाता है.


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https://hindi.news18.com/news/lifestyle/health-children-mobile-addiction-effects-screen-time-behavior-mental-health-issue-local18-10137745.html

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