All About Autoimmune Disorders: हमारा इम्यून सिस्टम शरीर का सुरक्षा कवच होता है. जब भी कोई वायरस, बैक्टीरिया या अन्य हानिकारक तत्व शरीर में घुसते हैं, तब इम्यून सिस्टम उन पर अटैक करके खत्म करने की कोशिश करता है. बीमारियों से बचाने में यह हमारे शरीर की ढाल है. हालांकि कई बार इम्यून सिस्टम कंफ्यूज हो जाता है और अपने ही शरीर की सेल्स और टिश्यूज पर अटैक करने लगता है. इस कंडीशन में ऑटोइम्यून डिजीज पैदा हो जाती हैं. आज दुनियाभर में ऑटोइम्यून बीमारियों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. सबसे चिंता की बात यह है कि इन बीमारियों का पूरी तरह इलाज संभव नहीं है और इनसे बचना भी मुमकिन नहीं है. यही वजह है कि इन बीमारियों के साथ जिंदगी जीना बहुत मुश्किल होता है.
ऑटोइम्यून डिजीज शरीर के लगभग हर हिस्से को प्रभावित कर सकती हैं. कुछ बीमारियां जोड़ों और मांसपेशियों पर असर डालती हैं, जैसे रूमेटॉइड आर्थराइटिस और ल्यूपस. कुछ त्वचा और ब्लड वेसल्स को नुकसान पहुंचाती हैं, जैसे सोरायसिस, विटिलिगो और स्क्लेरोडर्मा. वहीं कुछ बीमारियां पाचन तंत्र को प्रभावित करती हैं, जैसे क्रोन्स डिजीज, सीलिएक डिजीज और अल्सरेटिव कोलाइटिस. टाइप-1 डायबिटीज और थायरॉयड से जुड़ी बीमारियां एंडोक्राइन सिस्टम को प्रभावित करती हैं, जबकि मल्टीपल स्क्लेरोसिस जैसी बीमारियां नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुंचाती हैं.
ऑटोइम्यून डिजीज के लक्षण हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं. आमतौर पर इनमें लंबे समय तक थकान, जोड़ों में दर्द और सूजन, त्वचा पर लाल चकत्ते, मांसपेशियों में कमजोरी, पाचन संबंधी समस्याएं और बार-बार बीमार पड़ना शामिल है. इन बीमारियों की खासियत यह भी है कि इनके लक्षण अक्सर बार-बार उभरते और शांत होते रहते हैं, जिन्हें फ्लेयर कहा जाता है. कई बार मरीज खुद भी समझ नहीं पाता कि उसकी हालत क्यों अचानक बिगड़ जाती है.
ऑटोइम्यून डिजीज क्यों होती हैं, इसका सटीक कारण अभी तक स्पष्ट नहीं है. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इसके पीछे जेनेटिक कारण, वायरल इंफेक्शन, हार्मोनल बदलाव और पर्यावरणीय कारक जिम्मेदार हो सकते हैं. रिसर्च में यह भी सामने आया है कि महिलाओं में ऑटोइम्यून बीमारियों का खतरा पुरुषों की तुलना में ज्यादा होता है. इसके अलावा जिन परिवारों में पहले से ऑटोइम्यून डिजीज रही हैं, वहां अगली जेनरेशन में इसका जोखिम बढ़ सकता है.
ऑटोइम्यून डिजीज से पूरी तरह बचाव लगभग नामुमकिन है. दरअसल इनका कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, इसलिए इन्हें रोकने का कोई तरीका मौजूद नहीं है. हालांकि हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाना, स्मोकिंग से दूर रहना, संतुलित आहार लेना और समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराना जोखिम को कुछ हद तक कम कर सकता है. एक ऑटोइम्यून बीमारी होने पर दूसरी बीमारी का खतरा भी बढ़ सकता है, जिसे मेडिकल भाषा में ‘मल्टीपल ऑटोइम्यून सिंड्रोम’ कहा जाता है.
ऑटोइम्यून डिजीज का भले ही कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन सही इलाज से लक्षणों को कंट्रोल किया जा सकता है. डॉक्टर आमतौर पर दर्द निवारक, सूजन कम करने वाली दवाएं, इम्यून सिस्टम को दबाने वाली दवाएं और जरूरत पड़ने पर फिजियोथेरेपी की सलाह देते हैं. कुछ मामलों में खास इलाज भी जरूरी होता है, जैसे टाइप-1 डायबिटीज में इंसुलिन थेरेपी या सीलिएक डिजीज में ग्लूटेन-फ्री डाइट. ऑटोइम्यून डिजीज जीवनभर रहती हैं, लेकिन कई मरीजों में लंबे समय तक रेमिशन भी देखा जाता है. समय पर पहचान, डॉक्टर से नियमित फॉलोअप और लाइफस्टाइल में जरूरी बदलाव करके मरीज सामान्य और एक्टिव जीवन जी सकता है.
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https://hindi.news18.com/news/lifestyle/health-what-are-autoimmune-diseases-how-they-affect-human-body-causes-symptoms-and-treatment-10132802.html







