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Delhi Neuromodulation Therapy Giving New Life to Stroke Patients

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Neuromodulation Therapy: यहां पर अपना इलाज करवा रहे बिहार के रहने वाले रंजीत कुमार ने बताया कि उन्हें दो महीने पहले स्ट्रोक पड़ा था. स्ट्रोक होने की वजह से वह चल फिर नहीं पाते थे. बोल भी नहीं पाते थे. जिंदा लाश बन गए थे लेकिन 15 दिन से यहां पर अपना इलाज करवा रहे हैं और इस थेरेपी के जरिए अब उनके हाथ पैर भी चल रहे हैं. 

नई दिल्लीः दिल्ली के बड़े सरकारी अस्पताल में एक वरदान थेरेपी आ गई है. जिसके जरिए स्ट्रोक से बेजान हो चुके शरीर में भी जान आ जाएगी. यही नहीं सिर में गहरी चोट लगी हो या फिर पार्किंसंस की दिक्कत हो या फिर चलने फिरने में दिक्कत हो. इसके अलावा कमर दर्द और गर्दन दर्द का यह सटीक इलाज करेगी. इस थेरेपी का नाम है न्यूरोमॉड्यूलेशन एवं फुट प्रेशर एनालिसिस प्रयोगशाला जोकि अटल बिहारी वाजपेई आयुर्विज्ञान संस्थान एवं डॉ. राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल में शुरू हो चुकी है. यह प्रयोगशाला अस्पताल के ओपीडी ब्लॉक में थर्ड फ्लोर पर कमरा नंबर 308 में चल रही है. इसे डिपार्टमेंट ऑफ फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैबिलिटेशन में शुरू किया गया है. जहां पर स्ट्रोक की वजह से बोलना और चलना फिरना खो चुके बिहार के शख्स को नई जिंदगी मिल चुकी है और वह अब बोलने लगे हैं. उनके हाथ पैर भी चलने लगे हैं. 90% तक उनके शरीर में सुधार हो चुका है.

इस तरह काम करती है मशीन
विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर चेतन ने बताया कि देश का यह पहला पीएमआर विभाग है. जहां पर दोनों मशीन हैं जैसे न्यूरोनैविगेशन सहित ट्रांसक्रेनियल मैग्नेटिक स्टिम्यूलेशन. उन्होंने बताया कि जो भी मरीज अपनी एमआरआई की इमेज यानी रिपोर्ट यहां लेकर के आता है. चाहे वो हमारे हॉस्पिटल की ओपीडी या न्यूरो विभाग की ओर से आए या कहीं से भी आए तो सबसे पहले उसकी एमआरआई की रिपोर्ट को न्यूरोनेविगेशन पर रख कर उस हिस्से को देखा जाता है. जहां पर चोट लगी है या जो हिस्सा काम करना बंद कर चुका है.  उसके बाद मरीज को एक चेयर पर बैठा कर प्रोब से उसके दिमाग के जिस हिस्से में चोट लगी होती है. उसको न्यूरोनेविगेशन के जरिए ढूंढा जाता है.  फिर प्रोब के जरिए मरीज के उस दिमागी हिस्से को एक्टिव करने का काम किया जाता है. यही वजह है कि इसमें मरीज को जल्दी फायदा होता है.

बिहार के रंजीत को मिली नई जिंदगी
यहां पर अपना इलाज करवा रहे बिहार के रहने वाले रंजीत कुमार ने बताया कि उन्हें दो महीने पहले स्ट्रोक पड़ा था. स्ट्रोक होने की वजह से वह चल फिर नहीं पाते थे. बोल भी नहीं पाते थे. जिंदा लाश बन गए थे लेकिन 15 दिन से यहां पर अपना इलाज करवा रहे हैं. इस थेरेपी के जरिए अब उनके हाथ पैर भी चल रहे हैं. वह बोल भी पा रहे हैं. वही रंजीत की पत्नी निर्भया देवी ने बताया कि इस स्ट्रोक से पहले उनके पति एकदम स्वस्थ थे. दिल्ली में ही एक छोटी सी नौकरी कर रहे थे, लेकिन स्ट्रोक के बाद से एकदम जिंदा लाश बन गए. जब से यहां पर इलाज करवाना शुरू किया तब से अब वह दोबारा बोल पा रहे हैं. उनको नई जिंदगी मिल गई है. खास बात यह है कि उनसे एक रुपए नहीं लिए गए. सब कुछ निशुल्क हुआ है. उन्होंने डॉक्टर और अस्पताल का धन्यवाद दिया है.

हफ्ते में 6 दिन होती है थेरेपी 
विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर चेतन ने बताया कि यह ओपीडी हफ्ते में 6 दिन होती है. सुबह 9:00 से लेकर 4:00 बजे तक. एक मरीज पर आधा घंटा दिया जाता है.  3 साल के ऊपर तक के बच्चों से लेकर सभी इस थेरेपी को ले सकते हैं. सिर्फ गर्भवती महिला और जिनको मिर्गी की शिकायत या जिनके शरीर में किसी भी तरह का कोई इंप्लांट किया गया है उन्हें भी यह नहीं दी जा सकती.

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Amit ranjan

मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और Bharat.one तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें

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वरदान है ये थेरेपी, स्ट्रोक से बेजान हो चुके बिहार के शख्स को मिली नई जिंदगी


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