खंडवा: खंडवा जिले की पवित्र तीर्थ नगरी ओंकारेश्वर में हर साल दशहरा का पर्व उत्साह से मनाया जाता है, लेकिन इस उत्सव की एक खास बात यह है कि यहां पर रावण का दहन नहीं किया जाता. यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है और आज भी इस नियम का पालन किया जाता है. इसका मुख्य कारण रावण का भगवान शिव का परम भक्त होना माना जाता है. ओंकारेश्वर की इस अनोखी परंपरा के पीछे कई धार्मिक और ऐतिहासिक संदर्भ जुड़े हुए हैं, जिनका पालन आज भी श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों द्वारा किया जाता है.
रावण: भगवान शिव का अनन्य भक्त
रावण को भगवान शिव का परम भक्त माना जाता है. ओंकारेश्वर में रावण का सम्मान इस रूप में किया जाता है कि दशहरा के मौके पर यहां न तो रावण का पुतला जलाया जाता है, न ही उसके भाई कुंभकरण और बेटे मेघनाद का. यह परंपरा इसलिए निभाई जाती है क्योंकि रावण ने शिव भक्ति के कारण अनंत काल तक पूजा का अधिकार प्राप्त किया था.
पंडित धर्मेंद्र पाठक ने बताया कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और ओंकारेश्वर से 10 किलोमीटर के दायरे में कहीं भी रावण का दहन नहीं किया जाता. शिव भक्तों का मानना है कि रावण का दहन करने से अनहोनी घटनाएं हो सकती हैं, क्योंकि भगवान शिव ने रावण की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे कई वरदान दिए थे. इसलिए, ओंकारेश्वर में रावण का सम्मान किया जाता है और उसके दहन से परहेज किया जाता है.
शिवकोठी में रावण दहन का विवाद
ओंकारेश्वर नगर के समीप स्थित ग्राम शिवकोठी में एक बार रावण का दहन किया गया था, जिसके बाद गांव में बड़ी अनहोनी घटित हुई. राव देवेंद्र सिंह, ओंकारेश्वर मंदिर के प्रबंधक ट्रस्टी, ने बताया कि रावण दहन के बाद गांव में बड़े विवाद उत्पन्न हो गए थे. गांव के लोग आपस में बंट गए, महिलाएं और पुरुष एक-दूसरे से बोलना तक बंद कर चुके थे. धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होना भी लोगों ने बंद कर दिया. इस स्थिति को देखकर गांव के बुजुर्गों ने आपसी समझौता करवाया और प्रण लिया कि अब से गांव में रावण का दहन नहीं किया जाएगा. यह घटना इस बात का प्रमाण है कि इस क्षेत्र में रावण दहन को लेकर गहरी धार्मिक मान्यता और परंपरा जुड़ी हुई है.
परंपरा का निर्वहन
ओंकारेश्वर में प्राचीन काल से रावण दहन नहीं किया जाता है, और यह परंपरा आज भी बरकरार है. स्थानीय लोग इस परंपरा का सख्ती से पालन करते हैं और इस नियम का उल्लंघन करने से बचते हैं. यहां के श्रद्धालुओं का मानना है कि रावण के प्रति सम्मान व्यक्त करना ही शिव भक्ति का सच्चा रूप है.
ओंकारेश्वर में हर साल दशहरा का उत्सव पूरे हर्षोल्लास से मनाया जाता है, लेकिन रावण का दहन नहीं किया जाता. इसका कारण सिर्फ धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि इस परंपरा के साथ जुड़े कड़े सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू भी हैं.
धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
ओंकारेश्वर एक प्रमुख शैव तीर्थ है, जहां भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व है. ऐसे में रावण, जो शिव का अनन्य भक्त था, का दहन यहां एक अपमानजनक कार्य माना जाता है. यही वजह है कि इस इलाके में रावण के प्रति एक विशेष सम्मान का भाव है और उसे एक नायक के रूप में देखा जाता है, न कि एक खलनायक के रूप में.
निष्कर्ष
ओंकारेश्वर की इस अनूठी परंपरा ने इस पवित्र नगरी को एक अलग पहचान दी है. जहां देशभर में दशहरे के मौके पर रावण दहन का आयोजन होता है, वहीं ओंकारेश्वर में इसे शिव भक्त रावण का सम्मान समझा जाता है और दहन से परहेज किया जाता है. इस परंपरा ने न केवल धार्मिक आस्थाओं को जीवित रखा है, बल्कि इसे स्थानीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा भी बना दिया है.
FIRST PUBLISHED : October 12, 2024, 15:48 IST
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी, राशि-धर्म और शास्त्रों के आधार पर ज्योतिषाचार्य और आचार्यों से बात करके लिखी गई है. किसी भी घटना-दुर्घटना या लाभ-हानि महज संयोग है. ज्योतिषाचार्यों की जानकारी सर्वहित में है. बताई गई किसी भी बात का Bharat.one व्यक्तिगत समर्थन नहीं करता है.

















