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Sita-Ram Temple Jaipur: जयपुर का श्री सीताराम मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि वास्तुशिल्प और सांस्कृतिक वैभव का प्रतीक भी है. माता सीता और भगवान श्रीराम की अनूठी पूजा परंपरा, खास वास्तुकला और 29…और पढ़ें
श्री सीताराम मंदिर में माता सीता की दो मूर्तियां स्थापित हैं. एक मूर्ति काले पत्थर से बनी है, जो अचल रूप में विराजमान है, जबकि दूसरी मूर्ति अष्टधातु से निर्मित है और चलायमान रूप में स्थापित है. खास बात यह है कि इनमें से एक मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा जयपुर के संस्थापक सवाई जयसिंह ने करवाई थी. मंदिर में माता सीता के साथ भगवान श्रीराम की भव्य मूर्ति भी स्थापित है, जिनके चरणों पर सूर्य की पहली किरणें पड़ती है. मंदिर के पुजारी के अनुसार, माता सीता की मूर्ति ममता के स्वरूप में स्थापित है, जैसे मां अपने बच्चों को बुलाती है. यही कारण है कि भक्त खासतौर पर माता सीता के चरणों के दर्शन के लिए यहां आते हैं. यह परंपरा पिछले 297 वर्षों से निर्बाध रूप से चली आ रही है.
श्री सीताराम मंदिर में भगवान श्रीराम की पूजा एक अनोखी परंपरा के साथ की जाती है. पुजारियों के अनुसार, उनके पूर्वजों ने पूजा-अर्चना कर ठाकुर जी को रिझाया और सीताराम समाज की स्थापना की. इस समाज ने माता सीता का कन्यादान किया और स्वयं को जनकवासी मान लिया. इस मान्यता के अनुसार, माता सीता को बहन और भगवान श्रीराम को जीजा (दामाद) माना जाता है. इसलिए मंदिर में भगवान श्रीराम की पूजा दामाद के रूप में की जाती है. पुजारी बताते हैं कि जब जनकपुर में भगवान श्रीराम की बारात आई थी, तब वह 90 दिन तक रुकी थी. इसीलिए आज भी मंदिर में भगवान श्रीराम का आदर-सत्कार दामाद के रूप में किया जाता है. जयपुर में पांच परिवार ऐसे हैं, जो अयोध्या से जुड़ाव रखते हैं और इस परंपरा को जीवित रखते हुए भगवान श्रीराम को दामाद के रूप में सम्मान देते हैं.
प्रत्येक वर्ष माता सीता के जन्मोत्सव, जानकी नवमी, के अवसर पर मंदिर में भव्य आयोजन होता है. इस दौरान हजारों भक्त माता सीता और भगवान श्रीराम के दर्शन के लिए उमड़ते हैं. मंदिर का माहौल भक्ति और उत्साह से सराबोर हो जाता है. यह उत्सव मंदिर की धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को और बढ़ाता है. जयपुर के चारदीवारी बाजार में बने प्राचीन मंदिरों की सबसे खास बात उनकी एकसमान वास्तुकला और ठाकुर जी व श्रीराम की मूर्तियों की स्थापना है. श्री सीताराम मंदिर, जो लगभग 4200 वर्ग गज के क्षेत्रफल में फैला है, भारतीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है. मंदिर में विशाल गुम्बद और बरामदा इसकी सुंदरता को और बढ़ाते हैं. निर्माण के समय मंदिर की सजावट में लगभग 300 सोने की मोहरों की लागत आई थी, जिनकी चमक आज भी बरकरार है. मंदिर को इस तरह बनाया गया है कि सूर्य की पहली किरण इस पर पड़ती है. बाहरी हिस्से में बारीक नक्काशी की गई है, जो इसे और भी आकर्षक बनाती है.
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