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बिना नहाए पूजा कर सकते हैं या नहीं? किन परिस्थितियों में करें बिना स्नान के पूजा? जानें क्या कहते हैं धर्म शास्त्र

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हाइलाइट्स

हमें स्नान के बाद ही पूजा करना चाहिए. कई लोगों का मानना है भक्ति के लिए तन नहीं मन शुद्ध होना चाहिए.

Worshipping Rules: हिन्दू धर्म में ईश्वर की आराधना, खास तौर पर पूजा-पाठ को पवित्रता से जोड़कर देखा जाता है. लोक मान्यता है कि, घर के बाहर राह में घूमते हुए हम कई प्रकार से अशुद्ध हो जाते हैं और स्नान करने से शुद्धता आती है. ऐसे में हमें स्नान के बाद ही पूजा करना चाहिए. वहीं कई लोगों का मानना है कि ईश्वर की भक्ति के लिए तन नहीं मन शुद्ध होना चाहिए. यानी कि इसका स्नान से कोई लेना देना नहीं है. ऐसे में क्या है और क्या नहीं? पूजा के लिए स्नान कितना जरूरी है? और क्या बिना स्नान के पूजा का कोई महत्व नहीं? क्या कहते हैं हमारे धर्म शास्त्र? आइए जानते हैं भोपाल निवासी ज्योतिष आचार्य पंडित योगेश चौरे से.

पूजा के लिए स्नान का महत्व
हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार स्नान को सिर्फ शरीर को साफ करने का तरीका नहीं बल्कि मानसिक शुद्धता का प्रतीक भी माना जाता है. हमारे शास्त्रों में पूजा से पहले स्नान करने का मत्व बताया गया है. ऐसा कहा जाता है कि इससे ना सिर्फ शरीर के बाहरी बल्कि अंदर भी शुद्धता और पवित्रता आती है. ऐसी मान्यता है कि यदि आप बिना स्नान के पूजा करते हैं तो आपको उसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाता है. ऐसे में पूजा से पहले स्नान करना जरूरी है.

इन परिस्थति में कर सकते हैं बिना स्नान पूजा
बिना स्नान के पूजा आप कुछ परिस्थितियों में कर सकते हैं, जैसे आप जब बीमार हैं और स्नान नहीं कर सकते हैं तो आप ईश्वर की आराधना और पूजा बिना स्नान के भी कर सकते हैं. हालांकि, आपको यह पूजा शुद्ध मन के साथ करनी चाहिए.

स्नान के बाद ही भगवान की ​मूर्तियों को स्पर्श कर सकते हैं, लेकिन आप मंत्र जाप कर रहे हैं या मानसिक रूप से ईश्वर की आराधना कर रहे हैं तो आप यह बिना स्नान के भी कर सकते हैं. ध्यान रहे आप मूर्तियों को स्पर्श ना करें.

मंत्रों के जाप से शुद्धिकरण
यदि आप किन्हीं परिस्थितियों में स्नान नहीं कर पाए हैं और पूजा कर रहे हैं तो शास्त्रों में कुछ ऐसे नियम बताए गए हैं, जिससे आप शारीरिक और आंतरिक रूप से खुद को शुद्ध कर सकते हैं. इसके लिए आपको ‘अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा. यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः..’ मंत्र का जाप करना चाहिए.

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