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बेटा ही क्यों देता है मुखाग्नि?, लड़कों को ही क्यों दी गई है अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी?, क्या है ‘पुत्र’ का अर्थ, जानें एक्सपर्ट से

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Antim Sanskar By Son : अंतिम संस्कार एक धार्मिक प्रक्रिया ज़रूर है, लेकिन इसका असली मकसद मृतक को श्रद्धा और सम्मान के साथ विदा करना है. चाहे बेटा हो या बेटी अगर मन में प्रेम, सम्मान और ज़िम्मेदारी हो, तो कोई …और पढ़ें

बेटा ही क्यों देता है मुखाग्नि?, लड़के ही क्यों करते हैं अंतिम संस्कार? जानें

लड़के ही क्यों करते हैं अंतिम संस्कार?

हाइलाइट्स

  • अंतिम संस्कार में बेटा ही क्यों देता है मुखाग्नि?
  • पुत्र का अर्थ है माता-पिता को मृत्यु के बाद राह दिखाने वाला.
  • समाज और कानून अब बेटियों को भी अंतिम संस्कार की अनुमति देते हैं.

Antim Sanskar By Son : भारतीय संस्कृति में कई रीति रिवाज सदियों से चले आ रहे हैं. इन्हीं में एक परंपरा है – किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके अंतिम संस्कार का काम बेटे के जरिए किया जाना. खासकर हिन्दू धर्म में यह मान्यता बहुत मजबूत है कि अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में बेटा ही सबसे ज़रूरी भूमिका निभाता है. लेकिन ऐसा क्यों है? क्या इसका कोई धार्मिक या सामाजिक कारण है? आइए, इसे सरल भाषा में समझने की कोशिश करते हैं. भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा से.

अंतिम संस्कार
माना जाता है कि जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसकी आत्मा को शांति तभी मिलती है जब उसका अंतिम संस्कार सही तरीके से किया जाए. इस प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण होता है मुखाग्नि देना, यानी शव को अग्नि देना. यह काम पारंपरिक रूप से बेटे के माध्यम से किया जाता है.

पुत्र का अर्थ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, “पुत्र” का मतलब होता है – वह जो अपने माता पिता को मृत्यु के बाद भी राह दिखाए. एक मान्यता यह भी है कि ‘पुत्र’ दो अक्षरों से मिलकर बना है – ‘पु’ यानी नरक और ‘त्र’ यानी छुटकारा दिलाने वाला. यानी बेटा वह होता है जो अपने माता पिता को जीवन के बाद की यात्रा में कठिनाइयों से बचाता है. इस सोच के आधार पर बेटे को यह ज़िम्मेदारी दी गई.

बेटियों को नहीं थे ज्यादा अधिकार
प्राचीन समय में समाज का ढांचा कुछ अलग था. उस दौर में बेटियों को ज़्यादा अधिकार नहीं दिए जाते थे. उन्हें घर से बाहर जाने, निर्णय लेने या सामाजिक कार्यों में भाग लेने की छूट कम थी. इसलिए यह भी माना गया कि बेटियों के लिए अंतिम संस्कार जैसे कार्य करना उचित नहीं होगा. यही सोच धीरे धीरे परंपरा बन गई.

बेटा घर का उत्तराधिकारी
एक और बात यह भी मानी जाती है कि बेटा घर का उत्तराधिकारी होता है, वही वंश को आगे बढ़ाता है, इसलिए मृत्यु के बाद की ज़िम्मेदारी भी उसी की होती है. परंतु समय के साथ हालात बदले हैं. अब बेटियां भी अपने परिवार का साथ पूरी जिम्मेदारी के साथ निभा रही हैं. कई बार बेटियां ही अपने माता पिता की देखभाल करती हैं और मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया भी पूरी करती हैं.

बेटी भी करने लगी अंतिम संस्कार
आज के समय में कानून और समाज दोनों ही इस बात की इजाज़त देते हैं कि बेटी भी अंतिम संस्कार कर सकती है. कई शहरों में बेटियां अपने माता या पिता को मुखाग्नि देती हैं और समाज भी इसे सम्मान की नज़र से देखने लगा है. धीरे धीरे परंपराओं में बदलाव आ रहा है और लोग भावनाओं को ज़्यादा महत्व दे रहे हैं.

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